नवंबर 23, 2012

मातम में डूबा पूरा गाँव

मुकेश कुमार सिंह : पुलिस की हीला--हवाली और लापरवाही की वजह से एक परिवार का दीपक हमेशा के लिए बुझ गया।18 नवम्बर को सहरसा से अगवा हुए दीपक की ह्त्या कर लाश को पुर्णिया जिले के सरसी थाना के मझुआ गाँव के एक गड्ढे में फेंक दिया गया था जिसकी शिनाख्त कल मृतक के परिजनों ने सरसी जाकर की।दीपक की लाश बीती देर रात उसके गाँव मुरली वसंतपुर पहुंची।लाश गाँव पहुँचते ही पुरे गाँव में मातम की सुनामी आ गयी।पुलिस अधिकारी अपनी लापरवाही पर पर्दा डालते हुए अब प्रेम प्रसंग या फिर कमीशन पर चेन्नई में इंजीनियरिंग में एडमिशन कराने के धंधे को ह्त्या की वजह बता आगे उचित कारवाई की बात कर रहे हैं।
  मृतक के घर के बाहर भारी भीड़ जमा है और हर कोई एक दुसरे से आँखों ही आँखों में यह सवाल करता दिख रहा है की आखिर यह क्यों और कैसे हो गया।चारों तरफ चीख और चीत्कार की आवाज गूंज रही है।आँखें यहाँ आंसुओं से तर और सीने चाक हो रहे हैं।दीपक घर का इकलौता चिराग था जो एक झटके में बुझ गया।मृतक के परिजन रो-रो कर बस विलाप किये जा रहे हैं।बहन,माँ और चाची सब बस यही कह रही हैं की दीपक के हत्यारे को ढूंढ़ कर ला दीजिये।दीपक को इन्साफ दिलवाईये।दीपक की माँ अरहुलिया देवी मातमी गीत के लहजे में अपने दर्द को बयां कर रही है।सच में पूरा घर और गाँव मातम में डूबा हुआ भगवान् को भी रोने को विवश कर रहा है।
अजीत सत्यार्थी,एस.पी,
सहरसा
 ह्त्या जैसी घटना घटी हो तो सियासी लोग सियासत करने से कहाँ बाज आने वाले।महिषी राजद विधायक अब्दुल गफूर भी दल-बल के साथ पीड़ित से मिलने पहुँच गए।उनका कहना है की इस बात की जानकारी लालू प्रसाद से लेकर राम विलास पासवान तक को है।वे हत्यारे तक पहुँचने के लिए हर संभव मदद के लिए कटिबद्ध हैं। पुलिस के अधिकारी इस मामले में पुलिस की लापरवाही मानने को बिलकुल तैयार नहीं हैं।पुलिस अधीक्षक का कहना है की ह्त्या की दो वजह हो सकती है।पहला प्रेम प्रसंग या फिर दूसरा कमीशन पर चेन्नई में इंजीनियरिंग में एडमिशन कराने का धंधा।बताना लाजिमी है की दीपक इस इलाके के लड़कों को डोनेशन पर चेन्नई में एडमिशन भी कराता था।खुद दीपक बी.आई.टी मेसरा,रांची में इन्व्रामेंटल साईंस और इंजीनियरिंग फेकल्टी का फाईनल ईयर का छात्र था। घर का इकलौता चिराग जब बुझ गया हो तो उस घर का आलम क्या होगा,इसे समझा जा सकता है।पुलिस ने अनुसंधान में देरी की है,यह एक सच है।अब दीपक इस दुनिया से कूच कर चुका है।अब पुलिस को उसके हत्यारे को ढूंढ़कर उसे सलाखों के भीतर पहुंचाने में किसी तरह की कोताही नहीं बरतनी चाहिए।

पुलिस की बेशर्म हीला---हवाली

 मुकेश कुमार सिंह  पुलिस की बेशर्म हीला---हवाली और पुलिस की बेशर्मी की इंतहा देखनी हो तो आप सीधे सहरसा चले आईये।बीते 18 नवम्बर से लापता  इंजीनियरिंग अंतिम वर्ष के छात्र दीपक का अभीतक कोई सुराग नहीं मिला है,यह उसी की बानगी है।यहाँ दो थाने के बीच क्षेत्र विवाद में पुलिसिया तफ्तीश पूरी तरह से शिथिल पड़ी हुयी है।इधर पीड़ित के परिजन छात्र के अपहरण किये जाने और उसकी जान को ख़तरा बता रहे हैं।बताना लाजिमी है की सहरसा  के मुरली वसंतपुर गाँव का रहने वाला 26 वर्षीय बी.आई.टी मेसरा,रांची के अंतिम वर्ष का छात्र दीपक कुमार बीते 18 नवम्बर को अपने गाँव से सहरसा रेलवे स्टेशन स्थित RMS में रजिस्ट्री करने आया था लेकिन उसके बाद से वह अभीतक अपने घर नहीं लौटा है।लापता छात्र के परिजनों ने सदर थाना में इस मामले की लिखित शिकायत की लेकिन सदर थानाध्यक्ष ने उन्हें रेलवे का मामला बता कर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की और उन्हें राजकीय रेल थाना भेज दिया,जहां इस मामले में गुमशुदगी का एक सनहा दर्ज किया गया।सहरसा पुलिस की बदमिजाज और बिगडैल रवैये से हलकान--परेशान पीड़ित के परिजन आज सैंकड़ों की तायदाद में ग्रामीणों के साथ एस.पी आवास के सामने धरने पर बैठ गए जहां उन्होनें सदर थानाध्यक्ष पर उन्हें बरगलाने और जिम्मेवारी से भागने का उनपर आरोप लगाया।
धरने पर बैठे लोगों का कहना था की जबतक छात्र की सकुशल बरामदगी नहीं होगी,वे जान दे देंगे लेकिन वहाँ से नहीं उठेंगे।सैंकड़ों लोग सुबह दस बजे से शाम तक धरने पर बैठे थे।पूरा माजरा समझते हुए सहरसा टाइम्स  ने एक बार फिर मामले में सिद्दत से दखल दिया।जाहिर तौर पर एस.पी ने सहरसा टाइम्स  की पहल के बाद इस मामले को न केवल गंभीरता से लिया बल्कि उन्होनें सदर थानाध्यक्ष को सदर थाना में मामला दर्ज कर गंभीरता से इस मामले का अनुसंधान करने का आदेश भी दिया।एस.पी के हस्तक्षेप और मामला सदर थाना में दर्ज किये जाने के बाद तत्काल लोग धरने पर से उठ गए।सहरसा पुलिस की एक बार फिर काली करतूत सामने आई है जो उसके नापाक चालों को बेपर्दा कर रही है।
बेलगाम अपराध पर लगाम लगाने में पूरी तरह से विफल सहरसा पुलिस अपनी बिगडैल और लापरवाह कार्यशैली की नयी इबारत लिखने में जुटी हुयी है।उसकी हीला--हवाली का खेल बदस्तूर जारी है।इस नापाक खेल में अगर इस छात्र की जान चली गयी तो इसकी जबाबदेही आखिर कौन लेगा।सोये तंत्र में अंधेरगर्दी मची है।सच मानिए,यह जिला अपराधियों और भगवान के रहमो--करम से चल रही है।

घर जलकर हुआ खाक

रिपोर्ट चन्दन सिंह : छठ पर्व में उगते सूर्य को अर्ग देने गए एक परिवार पर अग्नि देवता का बीते दिन  जमकर कहर बरपा।पूरा परिवार छठ घाट पर पर्व मनाने गया था और इस दौरान उसका घर धू--धू कर जल रहा था।बड़ी बात यह थी की मोहल्ले के अधिकाँश लोग भी पर्व मनाने छठ घाट पर ही गए थे।वे लोग विभिन्य घाटों से जबतक लौटकर आये तबतक घर जलकर खाक हो चुका था।घर में लगी आग को देखकर कुछ लोगों ने थाने तो कुछ ने अग्निशमन दस्ते को फोन किया।अग्न्मिशमन दस्ता आया भी लेकिन उसमें खराबी थी,इस वजह से उससे एक बूंद पानी भी नहीं टपक सका।फिर मोहल्ले के लोगों ने खुद से आग पर काबू पाया।सदर थाना के भवानी नगर में किराना की दूकान चलाने वाले विरेन्द्र झा के घर आग लगी थी जिसमें करीब चार लाख की संपत्ति जलकर ख़ाक होने का अनुमान है।पीड़ित परिवार का सबकुछ जलकर ख़ाक हो चुका है।सदमें में पूरा परिवार रो--रोकर बेदम है। आग ने देखते ही देखते एक परिवार को बेघर और कंगाल करके सड़क पर ला दिया।  विरेंद्र झा के घर का सारा सामान खाक हो चुका है।न पहनने के लिए कपडे और न खाने के लिए अन्न का एक दाना बचा है।नकदी और गहने भी जलकर ख़ाक हो गए हैं।पूरी तरह से यह परिवार फ़क़ीर हो चुका है।
एक परिवार पूरी तरह से खानाबदोश हो चुका है।सरकारी मदद के नाम पर खानापूर्ति हो चुकी है।अब मोहल्ले वाले इस परिवार को इस बड़ी आफत से उबारने के लिए कमर कस चुके हैं।लोग इस उजड़े परिवार की मदद में आगे भी आ रहे हैं।देखना दिलचस्प होगा की समाज इस परिवार के लिए कितना कारगर साबित होता है।

नवंबर 22, 2012

अपने शहर के सदर अस्पताल को जानिए

एक्सक्लूसिव डाटा सिर्फ सहरसा टाइम्स पर 
रिपोर्ट चन्दन सिंह कोसी प्रमंडल के PMCH कहे जाने वाले सदर अस्पताल में चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मियो की (दो माह पहले की स्थिति) स्थिति के बारे में ब्यौरा. 50 के दशक का बना यह अस्पताल 25 बेडों से शुरू हुआ.अस्सी के दशक में बेडों की संख्यां बढ़कर 96 हुई.फिर उसके बाद आज यह 240 बेडों वाला अस्पताल बन चुका है.करीब 30 एकड़ भूखंड पर पसरे इस अस्पताल में अनगिनत भवन हैं.
बताना लाजिमी है की 80 के दशक में जब इस अस्पताल में 96 बेड थे तब यहाँ 25 चिकित्सक,3 फार्मासिस्ट,4 ड्रेसर,2 ओटी बाबू,22 ए ग्रेड नर्स के पद सृजित थे.आज अस्पताल में ना केवल बेडों की संख्यां काफी बढ़ गयी है बल्कि अस्पताल में मरीजों की संख्यां में भी भारी इजाफा हुआ है.जाहिर तौर पर स्वास्थ्यकर्मी और चिकित्सकों की संख्यां में इजाफा किया जाना चाहिए.लेकिन वर्तमान में अभी महज 10 चिकित्सक,3 फार्मासिस्ट,4 ड्रेसर,ओटी बाबू एक भी नहीं और17 ए ग्रेड नर्स हैं.यही नहीं वार्ड बॉय 21 और महिला कक्ष सेविका की संख्यां 23 है.भण्डारपाल एक भी नहीं है.ओटी असिस्टेंट एक भी नहीं है.हद बात वतो यह है की इस अस्पताल में एक भी COMPOUNDER नहीं है.इसमें से भी चिकित्सक महोदय हों या फिर कर्मी छुट्टी से लेकर अन्य कार्यों में भी व्यस्त रहते हैं.आप समझ सकते हैं की यहाँ किस तरह इलाज चल रहा होगा.इस अस्पताल में कम से कम 40 चिकित्सक,6 फार्मासिस्ट,16 ड्रेसर,6 ओटी बाबू,60 ए ग्रेड नर्स,वार्ड बॉय 60,महिला कक्ष सेविका 30,भण्डारपाल 1,ओटी असिस्टेंट 4 और 20 COMPOUNDER की कम से कम जरुरत है.

नवंबर 09, 2012

गुम हो रहे कुम्हार के दिए

मुकेश कुमार सिंह,सहरसा: बिजली की चकाचौंध और चीनी भूक---भूक बत्तियों से पटे आज के बाजार से कुम्हारों के दिए बनाने के पुस्तैनी कारोबार पर ग्रहण लगने लगा है।दिवाली और छठ के मौके पर कुम्हारों के बनाए दिए,चुक्के और अन्य मिटटी के बर्तनों से जहां पूजा--पाठ और त्यौहार के मद्देनजर सजावटी काम बड़े उत्साह और समर्पण के साथ किये जाते थे वहीँ इस उद्यम से कुम्हारों का भी अच्छा कारोबार हो जाता था।लेकिन आज बिजली की चकाचौंध ने दिए और चुक्के के पुरे कुनबे को ही एक तरह से लील लिया है।अमूमन हर बाजार में चीनी चकमक से सजे बिजली के झालर और जुगनुओं से सजे अन्य सामान भरे रहते हैं।ख़ास बात यह है की आधुनिकता में और पर्यावरण में प्रदुषण के नाम पर लोग खासकर दीपों के महापर्व पर दिए और चुक्के के प्रयोग से न केवल अब कतराने लगे हैं बल्कि बिजली के जुगनुओं से पर्व को भी फ़टाफ़ट अंदाज पर मनाने का दृढ मन भी बना चुके हैं।जाहिर तौर पर लोगों के बदले मिजाज और बाजार पर चढ़े नए रंग से आज कुम्हारों के पुस्तैनी कारोबार पर न केवल ग्रहण लग रहा है बल्कि उनके पेट पर भी बड़ा ख़तरा मंडरा रहा है।जिस दिया--बाटी और चुक्के से कुम्हारों के एक मुश्ते साल भर की कमाई होती थी वह धंधा आज बंद होने के कगार पर है।सही मायने में आब चीनी चकमक से गुम हो रहे हैं कुम्हार के दिए.
                              
दीपों का अनूठा और महान महापर्व दिवाली सामने है।यह वह पर्व है जिसके आने का जहां आमलोग हर्ष और उल्लास के इजहार से पर्व मनाने के लिए इसका इन्तजार करते हैं वहीँ समाज का एक तबका कुम्हारों का ऐसा है जो अपने घर परिवार की गाड़ी बेहतर तरीके से खिंच सके इसके लिए इन्तजार करते हैं।दीया--बाती,चुक्के और अन्य मिटटी का सामान चाक पर गढ़के कुम्हार दिवाली के मौके पर साल भर की कमाई कर लेते थे।इस पर्व के मौके पर हुयी कमाई से इन कुम्हारों के परिवार के दिन कुल--मिलाकर अच्छे कटते थे।लेकिन विगत कुछ वर्षों से कुम्हारों के पुस्तैनी कारोबार चीन निर्मित झालर और बिजली के सामानों से खासे प्रभावित हैं।लोग पहले दिवाली में घी के दिए जलाते थे लेकिन समय बदला और लोग पहले सरसों तेल फिर किरासन तेल से काम चलाने लगे।अब वह समय भी लगभग जाने को है।लोग बदले परिवेश में पर्व--त्यौहार को भी बस मना देने के अंदाज में मनाने लगे हैं।बाजार में बिजली के जुगनुओं की भरमार है जिसे अपने घर में सजा कर लोग दीया और चुक्के से एक तरह से परहेज करने लगे हैं।जाहिर सी बात है इससे कुम्हारों के पेट पर लात पर रही है।चाक पर कुम्हार के घर की महिलायें और मासूम नौनिहाल भी दीया,चुक्का और मिटटी के अन्य बर्तन बनाते हैं। घर की महिलायें कह रही हैं की अब उनके द्वारा बनाए गए सामानों के खरीददार काफी कम हो गए हैं।सरकार भी उनकी कोई मदद नहीं करती है।घर का चुल्हा सालों भर ठीक से जल पाना भी अब मुश्किल है।
अपने पुस्तैनी कारोबार की विरासत को संभाले उमेश पंडित चाक घुमा--घुमाकर दीया और चुक्के तो बना रहे हैं लेकिन बेमन से।दिवाली के मौसम में बस कुछ दिए और अन्य मिटटी के सामान वे बनाते हैं लेकिन वह भी बिकना मुश्किल हो जाता है।इस कारोबार के अलावे वे मजदूरी करते हैं तो जाकर दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो पाता है।क्या करें पुश्तैनी कारोबार है,इसे छोड़ भी नहीं सकते।यानी उमेश पंडित यह कारोबार को बस ढ़ोने का धर्म निभाते दिख रहे हैं।
                                                            घर का चुल्हा कहीं खामोश न हो जाए,इससे लिए अंगीठी को जलाए रखने की कोशिश में मासूम नौनिहाल भी चाक चलाने के लिए मजबूर है। जिस मासूम उँगलियों में कलम और नन्हे हाथों में किताबें दबी होनी चाहिए वह चाक पर अपनी किस्मत को दौड़ा रहा है।मासूम जीतन विरासत में मिली गरीबी को चाक घुमाकर दूर करने की भागीरथ कोशिश करता दिख रहा है।पूछने पर कहता है की वह गरीब है।पहले पेट की भूख मिटानी है।इस चाक चलाते मासूम के अल्फाज आपके सीने को चाक कर जायेंगे।
दुकानदार भी यह मान रहे हैं की अब दीया--बाती से दिवाली मनाने के दिन अब लद गए।चीन निर्मित झालर और जुगनुओं से दिवाली मनाने में ही अब लोगों को न केवल मजा आ रहा है बल्कि उसमें ही उन्हें अपना सोसल स्टेटस भी बढ़ा हुआ दिख रहा है।
समाज में अभी भी कुछ ऐसे लोग हैं जो दिए--चुक्के सहित अन्य मिटटी के बर्तन के इस्तेमाल से दिवाली मनाते हैं।लेकिन हालात ऐसे बन रहे हैं जिससे ऐसा प्रतीत हो रहा है की आने वाले कुछ वर्षों के भीतर कुम्हारों का यह पुश्तैनी कारोबार पूरी तरह से बंद हो जाएगा।चाक पर अपनी कारीगरी का जौहर दिखाने वाले ये कुम्हार आगे कौन सा धंधा अपनाकर अपने परिवार को चलायेंगे,अभी इसपर शब्द रखना बेमानी है।सहरसा जिले में डेढ़ लाख से ज्यादा की आबादी वाले कुम्हार परिवार पर आफत के घने बादल मंडरा रहे हैं।इस मसले पर सरकार पहले से ही खामोश दिख रही है।

*अपनी बात*

अपनी बात---थोड़ी भावनाओं की तासीर,थोड़ी दिल की रजामंदी और थोड़ी जिस्मानी धधक वाली मुहब्बत कई शाख पर बैठती है ।लेकिन रूहानी मुहब्बत ना केवल एक जगह काबिज और कायम रहती है बल्कि ताउम्र उसी इक शख्सियत के संग कुलाचें भरती है ।