अगस्त 15, 2015

सहरसा की बेटी का दर्द देखो सरकार.............

मुकेश कुमार सिंह की कलम से------- सरकार और उसके तंत्र जब गूंगे और बहरे हो जाएँ तो इंसाफ कहीं गुम होने लगता है. आज हम अपने इस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में सहरसा की एक बेटी के ऐसे दर्द से आपको रूबरू कराने जा रहे हैं, जिसे जानकर आपकी ना केवल रूह थर्रा जायेगी बल्कि आपका सीना भी चाक हो जाएगा..........


जब दिल दरक जाए......जब भरी जवानी में हमसफर इस रंग बदलती दुनिया में अकेला छोड़,आसमानी सत्ता के हवाले हो जाए.....जब सारे सतरंगी ख्वाब और अरमानों का जीवन के शुरआती दौर में ही सर कलम हो जाए.......आप समझ सकते हैं उस अभागी का जीवन दोजख में किस तरह से सिसकिया ले रहा होगा....किस तरह से सुबकियां ले रहा होगा.यह कहानी सहरसा जिला मुख्यालय के रिहायशी मुहल्ला बटराहा की रहने वाली अभागी पूजा का है.पूजा की शादी वर्ष 2011 में गुजरात के अहमदाबाद में तैनात कस्टम इंस्पेक्टर राजेश कुमार सिंह के साथ हुयी थी. राजेश कुमार सिंह सहरसा जिले के भरौली गाँव के रहने वाले थे. अपनी ड्यूटी पर अहमदाबाद में तैनात खासे मिलनसार राजेश फुले नहीं समा रहे थे.उन्हें पता था की उनकी पत्नी माँ बनने वाली है.जब प्रसव का समय बिल्कुल निकट आ गया तो वे छुट्टी लेकर 6 अप्रैल को सहरसा चले आये.लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था.11 अप्रैल को पूजा ने बेटे को जन्म दिया.बेटे को गोद में लेकर राजेश बेहद खुश थे.लेकिन यह ख़ुशी कुछ समय की थी.12 अप्रैल 2012 का वह मनहूस दिन.अचानक कुछ लम्हों के लिए बीमार पड़े राजेश कुमार सिंह की मौत ईलाज के दौरान हो गयी.उन्नीस वर्ष की उम्र में शादी हुयी और बीसवें वर्ष में ही पूजा बेबा हो गयी.पूजा अपने पति की मौजूदगी में ही माँ भी बन गयी थी.पेट खोलकर उसे बेटा हुआ था.बेटा महज दो दिन का ही था और वह अस्पताल के बेड पर ही थी की पति गुजर गए.अब आप अनुमान लगाईये की पूजा को मिली यह चोट कितनी गहरी थी और उसका जीवन कितना बोझिल और बेजार हो चुका था.

कहते हैं की जबतक सांस रहती है तबतक आदमजात जीने की कोशिश में जुटा रहता है.पति के गुजरने के बाद,पूजा के रिश्तेदारों ने उससे भरपूर हिम्मत दी और पूजा ने किसी तरह से खुद को सम्भाला.ग्रेजुएट पूजा वर्ष 2012 में ही अहमदाबाद गयी और पति की जगह अनुकम्पा पर नौकरी के लिए विभाग में आवेदन दिया.जाहिर सी बात है की खुद के अकेलेपन को भरने और बेटे के बेहतर भविष्य के लिए नौकरी आवश्यक थी.उस वक्त पूजा को अहमदाबाद में नौकरी मिलने का विभागीय अधिकारियों के द्वारा आस्वासन भी मिला. लेकिन आपको यह जानकार हैरानी होगी की वर्ष 2012 से लेकर अबतक पूजा कई बार अहमदाबाद और दिल्ली का चक्कर लगा चुकी है लेकिन उसे अभीतक नौकरी नहीं मिली है. गुजरात में वह तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने का प्रयास भी किया लेकिन उसे मोदी जी से मिलने नहीं दिया गया.विभागीय अधिकारियों ने उसे फिर से कोरा आस्वासन देकर पहले तो उसका मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी लिया और कहा की आपके फाईल को दिल्ली भेज दिया गया है.अधिकारियों ने पूजा से बड़े तल्ख़ लहजे में यह भी कहा की खाली सीट पर पहले स्थानीय गुजरात के लोगों की बहाली की जायेगी, फिर जब जगह बचेगी तब आपको नौकरी मिलेगी. पूजा को एक तो किस्मत ने पहले ही दगा दिया अब नियम--कायदे,उसे सरकारी तोहफे में तकलीफ परोस रहे हैं. रोटी--बिलखती पूजा सहरसा टाईम्स से गुहार लगा रही है की हम कुछ ऐसी पहल करे,जिससे उसे नौकरी मिल जाए.वह चाहती है की वह अपने पाँव पर खुद से खड़ी हो सके और अपनी बेटे यशस्वी का बेहतर तरीके से परवरिश भी कर सके.पूजा अभी अपने माँ--बाप के साथ रह रही है.आगामी अठारह अगस्त को नरेंद्र मोदी जी की सहरसा के पटेल मैदान में रैली है.पूजा चाहती है की माननीय प्रधानमन्त्री उसकी चिंता करें और उसे फिर से जीने के लिए एक नौकरी दें.इसके रोदन को और इसके अथाह दर्द को देखकर हमारी आँखें भी नम हो गयी.
पिता संजय सिंह
एक बेटी के दर्द से उसके पिता संजय सिंह और माँ रंजना देवी भी आहत और गहरे सदमे में हैं.पेशे से ठेकेदार पिता भी घटना को लेकर तफसील से बताते हुए कहते हैं की अपनी बेटी के जीवन में फिर से खुशियाँ भरने के लिए वे लगातार अपनी बेटी के साथ अहमदाबाद और दिल्ली जाते रहे.लेकिन हद की इंतहा देखिये की उनके दर्द के पारावार के बाबजूद हुक्मरानों से लेकर अफसरानों तक का दिल नहीं पसीजा और वे अभीतक ठगे से हैं.जाहिर तौर पर तमाम प्रयास का नतीजा सिफर निकला.आगामी अठारह अगस्त को नरेंद्र मोदी जी की सहरसा के पटेल मैदान में रैली है.वे कहते हैं की सहरसा टाईम्स कोई ऐसी पहल करे की नरेंद्र मोदी जी मंच से ही पूजा को नौकरी देने की घोषणा कर दें.
पूजा अभी अपने मायके में है.माँ--बाप और भाई का उसे भरपूर प्यार मिल रहा है लेकिन जीवन में पति का एक अलग महत्व होता है.कम उम्र में ही सदियों का सितम यह मासूम झेल रही है.उसे नौकरी लग जाती तो हो सकता है की वक्त के साथ--साथ उसके गहरे और हरे जख्म भर जाते.साथ ही उसकी जिंदगी में भी कुछ ख्वाहिशों और कुछ सपनों को सिद्दत से जगह मिल जाती. बेटियों की हिफाजत और उसके बेहतर भविष्य को लेकर बेहद गंभीर रहने वाले माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,क्या सहरसा की इस अभागी बेटी की सुधि लेंगे?क्या पूजा की अँधेरी जिंदगी में फिर से उम्मीद के दिए टिमटिमाएंगे?क्या पूजा की बेपटरी जिंदगी फिर से पटरी पर आकर रफ़्तार पकड़ सकेगी?सहरसा टाईम्स इस बेटी के दर्द को मोदी जी तक पहुंचाने का हर सम्भव प्रयास करेगा.आगे रब जाने इसका क्या होगा.

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