जनवरी 23, 2013

अब "दामिनी"की अंतहीन कथा को रोकना होगा

जिस देश में नारी की पूजा होती हो वहाँ "दामिनी" के साथ हृदय विदारक घटना घटित हो,सहसा यकीन करना मुमकिन नहीं है।लेकिन जब सच शक्ल लिए साबूत सामने हो तो तमाम सांस्कृतिक मूल्य और विरासतें एक--एक कर धराशायी होते दिखते हैं।"दामिनी"महज एक बानगी है जो वर्तमान समाज में व्यक्ति के मानसिक भटकन को स्थायित्व दे रहा है।जाहिर तौर पर करोड़ों की आबादी वाले इस देश में इस तरह की कुछ घटनाएं ही सामने आ पाती हैं जबकि बहुतेरी ऐसी घटनाएं सुचना तंत्र के अभाव या अन्य मर्यादाओं की ओट में छुपी रह जाती हैं।मुद्दा संवेदनशील भर नहीं बल्कि आदमजात की चैतन्यता पर भी प्रश्न खड़े करने वाला है।इस विषय पर समाज के वृहत्तर पैमाने पर गहन चिंतन,मनन और बहस--विमर्श की जरुरत है।दामिनी इस दुनिया से असमय कूच कर चुकी है लेकिन उसकी दर्दीली विदाई कई बड़े--बड़े और जलते सवाल छोड़ गए हैं।
मुकेश कुमार सिंह की कलम से-------  भारत जैसे विशाल देश में जिसके उद्दभव और बुनियाद में अच्छी वृतियां और गुणी संस्कार भरे हों,वहाँ इंसानियत की गिरावट के आधिक्य परिलक्षित हो रहे हैं।जाहिर तौर पर यह पौराणिक और नैसर्गिक मूल्यों के पतन को दर्शा रहा है।उत्थान,उत्कर्ष और विकास के अर्थ की व्यापकता में नैतिकता लगभग गौण हो चुकी है।ऐसा नहीं है की पुरानी व्यवस्था में भूल और गलतियां नहीं होती थी।इतिहास इस बात का गवाह है की श्रृष्टि सृजनकाल से ही अच्छाई और बुराई दोनों साथ चल रहे हैं।लेकिन आज के परिपेक्ष्य में मानव मूल्यों के ह्रास का ग्राफ पराकाष्ठा पर है। 
स्वच्छंदता और समानता सार्वभौम आवश्यक जरुरत हो सकती है लेकिन उसे भारतीय परिवेश के मूल्यों के सांचे में पिरोया होना चाहिए।शारीरिक जरुरत की अपनी कार्यशैली और क्रियाशीलता है जिसमें मानसिक संतुलन और रिश्तों की मर्यादा के साथ--साथ पुरातन मान्यताओं का स्वस्थ स्पंदन नितांत जरुरी है।बदलते परिवेश में समाज का ढांचा चरमराया है।इतिहास की खोह में उतरकर जब देखने की कोशिश होगी तो मूल्य संचित व्यवहारों को जीवित रखने के लिए इच्छाओं के बलिदान की सच्ची कहानी मालूम होगी।आज इच्छाओं पर अंकुश नहीं हो रहा है जिसका परिणाम समाज में विभिन्य स्तरों पर देखा जा सकता है।आप पीछे को देखें तो भारतीय संस्कृति के अन्दर किसी गाँव के एक अच्छे छवि वाले व्यक्ति की जब मौत होती थी तो ना केवल उस गाँव का चुल्हा उस दिन खामोश रहता था बल्कि कई दिनों तक उस गाँव में मातम रहता था।लेकिन आज के समय में सगे रिश्तेदार की मौत पर भी सभी कुछ हल्केपन के साथ बड़े नाटकीय ढंग से निपटा लिया जाता है।यह अलग बात है की अगर उस मौत पर कहीं सियासी नजर लग गयी हो तो कुछ वक्ती हलचल हो जाती है।
विषय की गंभीरता के लिए विषय पर बने रहना लाजिमी है।सवाल है की आखिर "दामिनी"के साथ इतनी वीभत्स घटना की परिस्थिति कैसे तैयार हुयी।इतने बड़े घृणित कार्य के लिए आत्मस्वीकृति कैसे मिली।आखिर इंसान इतना बेदर्द और हैवान कैसे हो गया।ऐसी वीभत्स घटनाओं के लिए कठोर कानून बनाए जाने की मांग और उसका बनना,हो सकता है की समाज को नियंत्रित और संतुलित करने के लिए आवश्यक हो।लेकिन यहाँ यह समझना बेहद जरुरी है की कानून,दंड और क्षमा सभी कुछ व्यक्ति पर ही लागू होता है और सभी कुछ उसी पर निर्भर करता है।ऐसे में,जीवन मूल्यों के धराशायी हो रहे दिवार को कठोर कानून से आखिर कैसे मजबूती से खड़ा किया जा सकेगा।दामिनी को जलता सवाल बनाकर पुरे देश में अभी बहस छिड़ी हुयी है।चूँकि यह घटना ऐसी जगह घटी है जहां देश के सर्वोच्च सरकारी और गैर सरकारी संस्थान हैं और कानून भी वहीँ से निकलते हैं।दामिनी जैसी घटना की पुनरावृति ना हो इसके लिए कड़े कानून बनाकर क्या यह संभव है?कड़े कानून से कुछ घटनाओं पर अंकुश जरुर लगाए जा सकते हैं।लेकिन बताते चलें की सामाजिक विषमता की वजह से पारदर्शिता के साथ कानून का समाज के निचले पायदान तक ससमय पहुँच पाना कतई आसान नहीं होगा।
ऐसा नहीं है की हम कड़े कानून बनने के पक्ष में नहीं है।इस जघन्य और बर्बर अपराध के विरुद्ध कठोर कानून जरुर बनने चाहिए।हम यह कहना चाहते है की हमारे देश में रिश्तों की एक बड़ी श्रृंखला है जिसपर हमारा समाज खड़ा और टिका हुआ है।माँ--बाप,बेटा --बेटी,चाचा--चाची,फूफा--बुआ,दादा--दादी,नाना--नानी,भाई--बहन,पति--पत्नी,जीजा---शाली और ना जाने और कितने अनमोल रिश्ते।हर रिश्ता की अपनी मर्यादा और उसकी सीमा है।आखिर आज किन कारणों से रिश्तों की गर्माहट कम हो रही है?आखिर क्यों आज रिश्तों की कोई मेड़ नहीं है?आखिर क्यों आज रिश्तों के दायरे को घुन्न लग रहे हैं।काम इच्छा की समय पर भरपाई,तुष्टि और पीढ़ी विस्तार के लिए विवाह संस्कार का भी इस समाज में इंतजाम है।तो क्यों आज रिश्ता अपनी शक्ल को बदलकर बदरंग हो रहा है।कई ऐसे प्रश्न हैं जिनके जबाब तलाशे जाने चाहिए।विकास और समृधि निसंदेह आवश्यक है लेकिन अंधदौड़ में नैतिकता की ह्त्या कतई जायज नहीं है।हमें अपने संस्कारों के दायरे में ही फलना--फूलना चाहिए।पहले संयुक्त परिवार का चलन था जहां पर बुजुर्गों का मान--सम्मान सर्वोपरि था।तब बुजुर्ग का आदेश आचरण बनता था।लेकिन आज घर के बुजुर्ग उपेक्षित हैं।पहले गुरुकुल था जहां नैतिक शास्त्र की पढाई सबसे जरुरी थी।पहले के समय में पारिवारिक जीवन को जीने के एक से बढ़कर एक गुर सिखाये जाते थे।लेकिन आज सबकुछ सिर्फ और सिर्फ हासिये पर हैं।हम कहना चाहते हैं की मानव मूल्यों और सत्कर्मों को कागजी वस्तु समझने की सोची--समझी गलती ही ऐसे घृणित अपराध की पटकथा लिख रहे हैं।दामिनी जैसी घटना को रोकने के लिए आंतरिक क्रान्ति की जरुरत है।बाहरी भौतिक चकाचौंध में जीवन का सही अर्थ कहीं गुम हो गया है।कड़े कानून के साथ--साथ स्त्री--पुरुष दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे और एक दुसरे के पूरक हैं की साबूत सोच के बूते ही "दामिनी" की घृणित कथा को दुहराने से रोका जा सकेगा।  

जनवरी 21, 2013

9 साला बच्ची ने गुरूजी पर लगाया छेड़छाड़ का आरोप

मुकेश कुमार सिंह: एक बार फिर पाक रिश्तों में अति विशिष्ट गुरु--शिष्य रिश्ते के चिथड़े उड़े हैं।महज नौ वर्षीय दूसरी कक्षा की एक छात्रा ने अपने स्कूल के प्रिंसिपल पर उसके साथ अप्राकृतिक और गलत कार्य करने की कोशिश का गंभीर आरोप लगाया है।सदर थाने में अपने परिजनों के साथ न्याय के लिए पहुंची पीड़िता बच्ची के बयान को पुलिस ने तत्काल प्राथमिकता देते हुए एक तरफ जहां थाने में तुरंत मामला दर्ज कर आरोपी प्रिंसिपल को गिरफ्तार कर लिया है।  यह नौ वर्षीय बच्ची है जो दूसरी कक्षा की छात्रा है।सदर थाना क्षेत्र के राधा नगर स्थित आवासीय फंडामेंटल ट्यूशन ब्यूरो में पिछले तीन वर्षों से  रहकर यह पढ़ रही थी।इस बच्ची के मुताबिक़ 18 जनवरी की रात में जब यह सोयी हुयी थी तो इसके गुरूजी नरेश मोहन झा जो स्कूल के प्रिंसिपल भी हैं उसके कमरे में आये और उसे अपनी गोद में बिठाकर उसके साथ गलत हरकत करने लगे।उसने इसका प्रतिकार करते हुए शोर किया तो गुरूजी वहाँ से भाग खड़े हुए।बच्ची ने आगे बताया है की स्कूल प्रिंसिपल उसके सिवा स्कूल की पांच और बच्चियों के साथ ऐसी हरकत कर चुके हैं।इसके मुताबिक़ उन बच्चियों में से अभी दो बच्चियां जहां गाँव में है वहीँ तीन बच्चियां अभी स्कुल में मौजूद हैं। बच्ची से सहरसा टाईम्स ने जब यह पूछा की उन पाँचों बच्चियों ने इस जघन्य घटना को लेकर क्या किया तो इसका कहना था की उन बच्चियों ने इसकी शिकायत अपने परिजनों से की थी।उसके परिजनों ने मार्च में परीक्षा खत्म होने के बाद स्कूल से उन्हें निकाल लेने की बात कही थी।पीड़िता का कहना है की वह पढ़ना चाहती है लेकिन इस परिस्थिति में आगे कैसे पढ़ पाएगी।पीड़िता बच्ची के पिता की पूर्व में ही वज्रपात की चपेट में आने से मौत हो चुकी है।इस बच्ची का परवरिश उसके RPF जवान मामा और शिक्षिका मामी कर रहे हैं।बच्ची के साथ थाने पहुंची उसकी मामी का कहना है की बच्ची ने उन्हें कल 19 जनवरी की सुबह में फोन करके घटना की जानकारी दी।वह कल 19 जनवरी को अपने गाँव पंचगछिया से सहरसा आई तो बच्ची ने उसे स्कुल से तुरंत ले जाने की बात कही।उन्होनें इस घटना को लेकर प्रिंसिपल से भी बात करनी चाही लेकिन वे वहाँ पर नहीं मिले।इनकी नजर में भी प्रिंसिपल ने बड़ा गुनाह किया है जिसे सजा दी जानी चाहिए।
आरोपी प्रिंसिपल
 अब हम आपको आरोपी प्रिंसिपल का बयान सुनाते हैं।इनकी मानें तो उन्हें इस आरोप को सुनकर कुछ समझ में ही नहीं आ रहा है की वे क्या कहें।जिसे वे अपनी बच्ची की तरह पाल रहे थे,आखिर वह ऐसा बयान देकर उन्हें क्यों कलंकित कर रही है।प्रिंसिपल साहब साफ़--साफ़ बताते हैं की जनवरी माह से उन्होनें स्कूल की फ़ीस बढ़ा दी है और पिछले तीन माह का बकाया भी बच्ची के परिजनों पर है।अब भगवान जाने झूठी बात से उन्हें क्यों फंसाया जा रहा है।
इस मामले में पुलिस अधिकारी पीड़िता के बयान को महत्व देते हुए उसी आधार पर काण्ड दर्ज कर कारवाई की बात कर रहे हैं।पुलिस ने काण्ड अंकित कर आरोपी गुरूजी को तत्काल गिरफ्तार भी कर लिया है।वैसे बताना लाजिमी है की छात्रावास में फिलवक्त मौजूद चार बच्चियों में से किसी ने भी इस घटना की पुष्टि नहीं की है।कुछ बच्चे भी छात्रावास में हैं,वे भी इस घटना से पूरी तरह से इनकार कर रहे हैं।इन बच्चों की माने तो छात्रावास में ऐसी किसी घटना के बारे में उन्होनें कभी कुछ सूना ही नहीं है।यानि इस तरह की कोई घटना यहाँ पर घटी ही नहीं है।
जाहिर तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार पुलिस के लिए पीड़िता का बयान सर्वोपरि है।पुलिस ने पीड़िता के बयान पर सदर थाना में मामला दर्ज कर आरोपी गुरूजी को गिरफ्तार भी कर लिया है।लेकिन गिरफ्त में आये गुरूजी के पुराने चरित्र और उनके व्यक्तित्व का जो इतिहास है उसमें न केवल एक गुरूजी की पूरी गरिमा छुपी हुयी है बल्कि उनका सामाजिक दायरा भी उत्तम और बेदाग़ है।इस मामले में एक साफ़--सुथरे व्यक्ति के जीवन भर की पूरी पूंजी का एक साथ क्षय है।पुलिस को पीड़िता के बयान का ख्याल तो रखना ही चाहिए लेकिन पूरी पारदर्शिता के साथ इस मामले की जांच भी होनी चाहिए।पुलिस को अगली कारवाई से पहले इस मामले का सिद्दत से तटस्थ पड़ताल करने की जरुरत है। सहरसा टाईम्स सदैव पीड़ितों के पक्ष में खड़ा रहा है लेकिन पीड़ित की वाजीवियत को समझना भी हमारा फर्ज है।पुलिस अधिकारियों को इस मामले में कतई जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेना चाहिए।एक संसय बरकरार है की कहीं यह घटना किसी अन्य वजह से प्रायोजित तो नहीं है।वैसे अब सारा कुछ पुलिसिया अनुसंधान पर निर्भर करता है की वे आगे क्या खंगाल कर निकालते हैं।मामला अति संवेदनशील है,इसलिए एक तरफ जहां इस मामले में स्कूल एसोशिएसन को आगे आना चाहिए वहीँ स्वस्थ समाज के गुनी लोगों को भी आगे बढ़कर सच खंगालने की सामूहिक कोशिश करनी चाहिए।यूँ बताते चलें की इस तरह के मामले समाज के चंद छुटभैये और सरफिरों के लिए महज सियासत और षड्यंत्र का सामान होता है।हमें ऐसे बेहुदे और नापाक क़दमों को भी कुचलने की जरुरत है।

जनवरी 20, 2013

महाराणा की पुण्य तिथि : सहरसा में आयोजित हुआ भव्य समारोह

रिपोर्ट सहरसा टाईम्स: सहरसा के कला भवन में वीर सेनानी महाराणा प्रताप की 415 वीं पुण्य तिथि बड़े धूमधाम से मनाई गयी। छातापुर के जदयू विधायक नीरज कुमार बबलू के संयोजन में इस भव्य कार्यक्रम का जहां सोनवर्षा राज के पूर्व निर्दलीय विधायक किशोर कुमार मुन्ना ने अध्यक्षता की वहीँ इस कार्यक्रम का उद्दघाटन प्रदेश के जदयू अध्यक्ष सह राज्य सभा सांसद वशिष्ठ नारायण सिंह ने की।सहरसा में पहली बार आयोजित इस पुण्य तिथि समारोह में क्षेत्र के विधायक,पूर्व विधायक,कई विशिष्ट जन सहित राज्य स्तरीय कई नेता और विशिष्ट जनों ने हिस्सा लिया।कार्यक्रम के मंच का संचालन कॉंग्रेस नेता नीरज कुमार गुप्ता ने किया।

सभी अतिथियों को तलवार सौंपकर सम्मानित किया गया।अन्य वक्ताओं के साथ--साथ इस कार्यक्रम के संयोजक नीरज कुमार बबलू ने इस मौके पर पहले तो महाराणा प्रताप के कृतित्व और उनके बलिदान को लेकर जमकर कसीदे कढ़े फिर इस पावन दिन के सुअवसर पर सामाजिक संगठन यूथ फोरम की स्थापना करते हुए विधिवत इसकी घोषणा की।इस फोरम से युवाओं को नयी दिशा मिले इसकी भी वे लगातार आगे कोशिश करेंगे,उन्होनें इसका मजबूत भरोसा भी लोगों को दिया।नीरज बबलू ने इस फोरम को लेकर विस्तृत जानकारी देते हुए कहा की उनका यह यूथ फोरम जब--जब समाज में कहीं भी गलत का सर उठेगा,जब भी गंदगी किसी भी स्वरूप में फन काढ़ेगी,उनका यूथ फोरम उसका सिद्दत से मुकाबला करेगा।यूथ फोरम के माध्यम से गरीब परिवार की बेटियों का सामूहिक विवाह भी संपन्न कराया जाएगा।यही नहीं यूथ फोरम के माध्यम से युवाओं के लिए रोजगार का भी आगे प्रबंध होगा।कुल मिलाकर यह ऐसा यूथ फोरम फोगा जिसमें जाति--धर्म से ऊपर उठकर महज स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए जीवंत स्पंदन होगा।साढ़े तीन घंटे तक चले इस कार्यक्रम का समापन शाम करीब साढ़े छह बजे हुआ।
इस कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण वशिष्ठ नारायण सिंह ने पहले तो महाराणा प्रताप के विराट वजूद को लेकर चर्चा की।फिर आगे उन्होनें नीरज बबलू के यूथ फोरम को लेकर खासी चर्चा की।वशिष्ठ नारायण सिंह ने यूथ फोरम के लिए कुछ आवश्यक टिप्स भी दिए।श्री सिंह ने कहा की इस फोरम में पारदर्शिता रहे और इसका संचालन एक आचार--संहिता के तहत हो।इस संगठन के माध्यम से वृक्षारोपण और अन्य सामाजिक सरोकार के काम पूर्वाग्रह से मुक्त होकर होने चाहिए।
महाराणा प्रताप की पुण्य तिथि पर पहली बार ऐसे भव्य कार्यक्रम का आयोजन कर एक तरफ जहां नीरज कुमार बबलू ने एक नयी परम्परा की शुरुआत करते हुए कोसी क्षेत्र के लोगों में शौर्य और ओज चस्पां हो इसकी नायाब पहल की है तो वहीँ दूसरी तरफ यूथ फोरम की शुरुआत करके और बाजार में विशाल जुलुस निकालकर अपने दम--खम को भी दिखाने का काम किया है।तटस्थ आँख से देखें तो पुण्य तिथि के बहाने एक तरह से यह नीरज कुमार बबलू का यह शक्ति प्रदर्शन था।यूँ बताते चलें की नीरज कुमार बबलू जदयू के पहले से ही दबंग विधायक माने जाते हैं।

जनवरी 19, 2013

सरकारी कम्बल का तमाशा

सहरसा टाईम्स की खास रिपोर्ट----

मुकेश कुमार सिंह : रेकॉर्ड तोड़ इस कडाके की ठंढ में सरकार ने सहरसा जिले की 18 लाख से ज्यादा आबादी को ठंढ से लड़ने के लिए 241 कम्बल भेजे। आप यह आंकड़े देखकर चौंकिए मत।बात इतने पर ही खत्म नहीं हो रही। हद की इंतहा तो यह है की एक तरह से कहर बरपाती ठंढ अब जाने को है लेकिन इन कम्बलों का अभीतक वितरण जरुरतमंदों के बीच नहीं किया जा सका है।  इस साल कडाके की लहू को जमा देने वाली प्राणघाती ठंढ की अनेकों तस्वीरें सहरसा टाईम्स ने अपने दर्शकों को कई बार दिखाया है। 
सहरसा जिले के दस प्रखंड में 153 पंचायत,नगर परिषद् के 40 वार्ड और सिमरी बख्तियारपुर नगर पंचायत के 15 वार्ड हैं। जिले की कुल आबादी की बात करें तो आंकडा 18 लाख से कुछ ज्यादा का है।इतने बड़े जिले के लोगों को ठंढ से लड़ने के लिए सरकार की तरफ से महज 241 कम्बल मिले। आप यह जानकार हैरान हो जायेंगे की कम कम्बल की वजह से इन कम्बलों को कहाँ और कैसे बांटा जाए,यह अभीतक मुसीबत बनी हुयी है।
मिसबाह बारी,डी.एम सहरसा
सहरसा टाईम्स ने सरकारी कम्बल को लेकर मिसबाह बारी,डी.एम सहरसा से बातचीत की तो उनका कहना था की सरकार की तरफ से उन्हें एक लाख की राशि प्राप्त हुयी थी जिसमें इतने कम्बल ही खरीदे जा सके।इनकी मानें तो सारे कम्बल बांटे जा चुके हैं।लेकिन यह डी.एम साहब सफ़ेद झूठ बोल रहे हैं। इन्होनें कहा की वर्ष 2008 में कुसहा त्रासदी के समय आये कुछ कपडे और चादर बचे थे,उसका वितरण भी इस ठंढ में कराया गया।बड़ा सवाल यहाँ यह भी है की कुसहा त्रासदी के मारे थोक में आज भी ऐसे अभागे परिवार हैं जो आजतक किसी तारणहार की बाट जोह रहे हैं। आखिर उस वक्त के इन बचे सामानों को उन पीड़ितों तक क्यों नहीं पहुंचाया गया। वैसे हाकिम अलग से कम्बल के आवंटन के लिए सरकार को लिख भी रहे हैं। भगवान जाने अगर आवंटन मिल भी गया तो वे कम्बल आगे कब और किस मौसम में बांटेंगे।
राजद जिला महासचिव क्षत्री यादव
 इस मुद्दे पर हमने विरोधी दल के लोगों को भी टटोलना चाहा। विरोधी दल के राजद के जिला महासचिव क्षत्री यादव का साफ़ कहना है की सरकार गरीब विरोधी है। सिर्फ नारे से काम चलाया जा रहा है। इतने कम कम्बल गरीबों के किसी काम का नहीं है।अच्छा होता जो ये सारे कम्बल जिले के अधिकारी आपस में ही बाँट लेते।
सहरसा टाईम्स ने एक बड़े खेल से आपको रूबरू कराया है। वैसे सबकुछ सरकार पर ही छोड़ना जायज नहीं है। इस नेक काम के लिए निजी संगठनों के साथ---साथ समाज के अन्य समृद्ध तंत्र को भी मजबूती से आगे आना चाहिए था। जाहिर तौर पर समाज को भी अपनी जिम्मेवारी का दायरा बढ़ाना होगा।

जनवरी 18, 2013

भीषण डकैती : एक घंटे तक चला डकैतों का तांडव

रिपोर्ट सहरसा टाईम्स : सिमरी बख्तियारपुर थाना के मोहनपुर गाँव में संयुक्त परिवार के चार भाईयों के घर एक साथ बेख़ौफ़ डकैतों ने भीषण डकैती की घटना को अंजाम दिया।रात बारह बजे के कुछ देर बाद 15--20 की संख्यां में हथियार से लैस डकैतों ने हमला बोलकर इस घटना को अंजाम दिया।डकैती की घटना का विरोध करने पर लाठी--डंडे से पीटकर एक महिला सहित तीन और बम मारकर एक को डकैतों ने जख्मी कर दिया।सभी जख्मी सदर अस्पताल में भर्ती हैं।घर के सबसे बुजुर्ग डाककर्मी शोभाकांत झा की हालत नाजुक है।इस डकैती की घटना में डकैतों ने ढाई से तीन लाख नकदी और करीब 12 लाख के जेवरात उड़ाए।घटना के बाद एस.पी रात में ही घटनास्थल पर पहुंचे थे।उनका कहना है की टास्क फ़ोर्स गठित कर डकैतों को दबोचने का वे हर संभव प्रयास कर रहे हैं।यहाँ बताते चलें की एस.पी साहब जो घायलों की संख्यां और लूट का ब्योरा दे रहे हैं वह पीड़ितों के बयान से बिल्कुल मेल नहीं खा रहा है।
सबसे पहले मोहनपुर गाँव स्थित डाककर्मी शोभाकांत झा के उस आवासीय परिसर को देखिये जहां पर उनके चार भाईयों का परिवार संयुक्त रूप से रह रहा है।डकैतों  ने बारी---बारी से सभी घरों में हमला बोलकर भीषण डकैती की घटना को अंजाम दिया।आप यहाँ का नजारा देखिये।सामान किस तरह से छितराए हुए हैं।विरोध करने पर डकैतों ने एक महिला सहित तीन घर के सदस्य और एक ग्रामीण युवक को बम मारकर जख्मी कर दिया।अब चलिए सदर अस्पताल।देखिये यहाँ पर जख्मी का इलाज चल रहा है।
गाँव से लेकर अस्पताल में पीड़ित और ग्रामीण चीख---चीखकर घटना के बाबत पूरी जानकारी दे रहे हैं।सभी डकैत हथियारों से लैस थे।डकैतों ने बम धमाके के साथ---साथ  हवा में कई चक्र गोलियां भी चलाई।प्रेम शंकर झा,ग्रामीण,भारती कुमारी, रिश्तेदार,वन्दना देवी और कुमोद कुमार झा इस घटना में जख्मी हुए और मौजूद कई लोग लूटपाट में गयी संपत्ति का भी पूरा ब्योरा दे रहे हैं।अस्पताल में एक पुलिस अधिकारी पीड़ितों का बयान लेने में जुटे हैं। 
अब एस.पी साहब को सुनिए। वे इस घटना को बड़ी घटना जरुर मान रहे हैं लेकिन इनके हिसाब से लुट की रकम महज 20 --25 हजार और कुछ गहने हैं।यही नहीं ये बम धमाके और गोलियों के चलने की बात से भी इनकार कर रहे हैं।यही नहीं इनकी नजर में सिर्फ तीन लोग इस घटना में जख्मी हैं जबकि सहरसा टाईम्स चार जख्मियों को दिखा रहा है।इन जख्मियों में एक युवक जो की ग्रामीण है बम धमाके में जख्मी हुआ है। एस.पी ने कहा की इस मामले में उन्होनें टास्क फ़ोर्स का गठन किया है जिसमे कई अधिकारियों को लगाया गया है। उन्हें उम्मीद है की जल्द ही घटना का पटाक्षेप कर लिया  जाएगा।
दावों से इतर इस जिले की जनता की सुरक्षा भगवान भरोसे या फिर अपराधियों के रहमोकरम पर टिका हुआ है।गत वर्ष 2012 में पुरे जिले में ढाई सौ से ज्यादा चोरी की घटना हुयी जिसमें करोड़ों की संपत्ति चोर ले गये।लेकिन आप यह जानकार हैरान हो जायेंगे की पानी पर डंडा पीटती पुलिस एक भी मामले का उद्दभेदन आजतक नहीं कर पायी है।जाहिर तौर पर बढ़ते अपराधिक वारदात से पुरे जिले में दहशत व्याप्त है।सच मानिए,इस जिले में पुलिस और कानून का नहीं बल्कि गुंडे-अपराधियों का राज चल रहा है।

जनवरी 17, 2013

कचरे में फना होती जिन्दगी

कचरे में फना होती जिन्दगी 
सहरसा टाईम्स एक्सक्लूसिव--------
मुकेश कुमार सिंह,
सहरसा टाईम्स
इस प्राणघाती और प्रलयंकारी ठंढ में कचरे की ढेर पर पड़ी दो इंसानी जिंदगियां इंसानियत को ना केवल शर्मसार कर रही है बल्कि आदमजात के मरे जमीर को धिक्कार---ललकार भी रही है।सहरसा रेलवे स्टेशन के समीप रेल पटरी के नीचे कचरे की ढेर पर दो व्यक्ति इस कदर सोये हुए हैं गोया कचरे की सल्तनत के वे दोनों बेताज बादशाह हों। हद की इंतहा तो यह है की भीड़ की शक्ल में लोग तमाशबीन हैं लेकिन कोई उन्हें वहाँ से उठाकर अस्पताल या कोई और वाजिब जगह ले जाने की जुगात में नहीं हैं। बड़ी मशक्कत बाद सहरसा टाईम्स ने इनदोनों को ना केवल यहाँ से उठवाया बल्कि यहाँ से उठवाकर अस्पताल भी पहुंचाया जहां अभी इनदोनों का इलाज चल रहा है।-
अपने----पराए का फर्क क्या होता है इसकी बानगी से आज हम आपको दो--चार करा रहे हैं।देखिये इन दो अलग-अलग व्यक्ति को।रेलवे पटरी के कचरे की ढेर पर किस तरह ये सोये हुए हैं।कहते हैं की जिसका कोई नहीं,उसका तो खुदा है यारों।लेकिन यहाँ तो लगता है की खुदा भी इनदोनों के लिए नहीं हैं।किस तरह से जिदगी बेजा और मजाक बनी यहाँ पर इंसानियत को तमाचा लगा रही है।अगर इनका अपना घर होता,अपने स्वजन--परिजन होते तो शायद ये इस तरह से कचरे पर निढाल नहीं हुए होते।हद की इंतहा तो यह है आने-जाने वाले भर नहीं बल्कि भीड़ की शक्ल में लोग बस एक तमाशा समझकर इनदोनों को बस निहार रहे हैं।
तमाशबीन बने लोगों से सहरसा टाईम्स ने यह सवाल किया की ये दोनों कडाके की ठंढ में मर जायेंगे,आपलोग इन्हें उठाकर अस्पताल या कहीं और जगह क्यों नहीं ले जाते।लोगों का कहना था की वे बाहर के लोग हैं।यहाँ तो कई लोग मौजूद हैं,आखिर कोई और क्यों आगे नहीं आ रहा।उनकी नजर में यह काम पुलिस-प्रशासन का है।हांलांकि लोगों का यह रुख देखकर सहरसा टाईम्स ने अपनी जिम्मेवारी निभायी और अपने खर्चे पर इनदोनों को सदर अस्पताल पहुंचाया,जहां अभी उनका इलाज चल रहा है।
ऊपर वाले तूने देने में तो कोई कमी नहीं की लेकिन किसे क्या मिला यह मुकद्दर की बात है।बेजा जिन्दगी के लिए आखिर कोई मेहरबां,कोई तारणहार ससमय सामने क्यों नहीं आता।आज लोग मदद भी सामने वाले की सूरत और हैसियत देखकर आखिर क्योंकर करते हैं।

जनवरी 16, 2013

रेलवे का फरमान है बेअसर

मुकेश कुमार सिंह
रेलगाड़ी, रलवे स्टेशन और रेलवे परिसर की स्वच्छता के लिए रेल मंत्रालय द्वारा यात्रियों के लिए जारी जुर्माने का फरमान सहरसा में न केवल बेअसर है बल्कि हद की इंतहा देखिये की इस फरमान की जानकारी न तो यात्रियों को है और न ही रेल अधिकारी और कर्मियों को ही।सहरसा रेलवे स्टेशन से पलायन की वजह से एक तो यात्रियों की भीड़ मेले की शक्ल में रोजाना देखने को मिलती है जहां फकत अफरा--तफरी का आलम होता है।ऐसे में रेलवे के द्वारा यात्रियों को गंदगी ना फैलाने का फरमान सुनाने भर से काम नहीं चलने वाला।इसके लिए रेलवे को बड़े होमवर्क के साथ यात्रियों के बीच जाना होगा।लेकिन जहां अधिकारी--कर्मी को ही इस फरमान की जानकारी न हो तो आप ऐसे फरमान के बेहतर परिणाम की कैसे उम्मीद पालेंगे।संभव है की इस फरमान का बिहार के अन्य रेलवे स्टेशन पर खासा असर हो लेकिन सहरसा में तो यह फरमान पूरी तरह से बेजा और मजाक बना हुआ है। 
सहरसा स्टेशन पर यात्रियों का हुजूम जमा है।किसी भी यात्री को यह मालूम नहीं है की गंदगी फैलाने पर उन्हें जुर्माना देना पड़ेगा। सहरसा टाईम्स ने रेलवे के इस फरमान की सिद्दत से पड़ताल की तो जो तस्वीर उभर कर सामने आई वह बेहद शर्मनाक थी।यात्रियों को इस फरमान की कोई जानकारी नहीं थी और हमारे द्वारा जुर्माने के जिक्र भर से वे डर--सहम गए। यात्रियों को जागरूक करने के लिए सहरसा रेलवे स्टेशन पर न तो कहीं कोई स्लोगन ही लिखे हुए हैं और न इस बात का किसी भी तरीके से प्रचार--प्रसार ही किया गया है।यात्री सहरसा टाईम्स से यह जरुर कह रहे हैं की गंदगी फैलाकर उन्होनें गलती की है।वे न केवल अभी गंदगी को साफ़ कर देंगे बल्कि वे आगे से कभी भी गंदगी नहीं फैलायेंगे।यह थोड़ी सी जागरूकता भी रेलवे की वजह से नहीं बल्कि सहरसा टाईम्स की पहल का नतीजा है।
हमने सबसे पहले प्लेटफ़ॉर्म पर सफाई कर कर रही महिला सफाईकर्मी अनीता देवी से जानना चाहा की क्या वे लोगों को गंदगी फैलाने से नहीं रोकती हैं।इनका जबाब था की वे रोकना चाहती हैं लेकिन यात्री उनसे उलझ जाते हैं और उन्हें पीटने पर आमदा हो जाते हैं।ऐसे में उनके बस में क्या है। 
सहायक स्टेशन मास्टर रंजय कुमार
अब आपको हम रेलवे के एक जिम्मेवार अधिकारी से मिलवाते हैं।ये हैं सहायक स्टेशन मास्टर रंजय कुमार।आप यह जानकार हैरान हो जायेंगे की इन्हें यात्रियों को गंदगी फैलाने पर किसी तरह का जुर्माना देना होगा,इसकी कोई जानकारी नहीं है।ये कहते हैं की यात्री गंदगी न फैलाएं इसके लिए स्टेशन परिसर में विभिन्य तरह के स्लोगन लिखे हुए बैनर--पोस्टर आदि होने चाहिए।ऐसा करने से यात्रियों में जागरूकता आएगी।लेकिन रेलवे परिसर में दूर--दूर तक ऐसा कुछ भी नहीं है।यह अधिकारी रेलवे पर खुद कई सवाल करते नजर आ रहे हैं।
 हम इतने पर ही बस नहीं बोले।यातायात निरीक्षक एस.एन पंडित से भी सहरसा टाईम्स ने इसको लेकर खास बातचीत की।इनकी मानें तो बिहार के लोगों में गंदगी फैलाने की आदत है।इनकी नजर में ऊपर से अभी ऐसा कोई फरमान नहीं मिला है जिसमें यात्रियों पर किसी तरह के जुर्माने की बात हो।वैसे दिल्ली से चले कागज़ को अपने गंतव्य तक पहुँचने में कुछ समय तो लग ही जाता है।यानि फरमान वाला कागज़ कहीं बीच में ही अटका हुआ है।
हद हो गयी भाई।ए ग्रेड के रेलवे स्टेशन सहरसा में यात्रियों से पहले रेल अधिकारी और रेल कर्मियों को ना केवल जागरूक करने की जरुरत है बल्कि उनको उनके कर्तव्य को लेकर कड़ा होमवर्क कराने की भी जरुरत है।फिलवक गंदगी फलाने पर जुर्माने का फरमान सहरसा में बेजा और मजाक बना हुआ है।

मेडिकल एजेंसी में लूट

सहरसा टाईम्स।।15 जनवरी की देर शाम चार की संख्यां में मोटरसाईकिल सवार अपराधियों ने सदर थाना क्षेत्र के रिहायशी मोहल्ला गंगजला स्थित एक आवासीय  परिसर में अवस्थित शिव गंगा मेडिकल एजेंसी में जमकर लूटपाट की। बेखौफ अपराधियों ने हथियार की नोंक पर करीब 75 हजार नकदी,दो मोबाइल और एक एटीएम कार्ड लुटे और हवा में हथियार चमकाते हुए वहाँ से चलते बने। रिहायशी मोहल्ले में घटी इस घटना से आमलोगों में खासा दहशत का माहौल है। मौके पर खुद पुलिस अधीक्षक ने पहुंचकर न केवल मामले की कमान अपने हाथों में ले लिया है बल्कि आनन्-फानन में टास्क फ़ोर्स गठित कर तहकीकात भी शुरू कर दी है। शिव गंगा मेडिकल एजेंसी पर खुद एस.पी अजीत सत्यार्थी पूछताछ में जुटे हुए हैं। शाम साढ़े आठ यह बजे घटना घटी। घटना को लेकर पीड़ित दूकान मालिक बताते हैं की अपराधी चार की संख्यां में थे। एक बाहर खडा था जबकि तीन अन्दर घुस आये और उनके साथ-साथ उनके दो स्टाफ को हथियार सटा दिया।
 दूकान के गल्ले से करीब 60--65 हजार नकदी,स्टाफ के दो मोबाइल,एक एटीएम कार्ड और स्टाफ की जेब से चार हजार रूपये लेकर वे चलते बने। एस.पी साहब इस घटना को काफी गंभीर बताते हुए कहते हैं की इस लूट की घटना के तुरंत बाद घटनास्थल पर पैदल पुलिस फ़ोर्स पहुँच गयी थी लेकिन अपराधी मोटरसाईकिल पर सवार होकर फरार हो गए थे।उनकी मानें तो जल्द इस मामले का पटाक्षेप कर लिया जाएगा।
इस जिले में पुलिस पर अपराधी भारी हैं।अगर घटना नहीं घट रही हो तो समझिये अपराधी लोगों पर रहम कर रहे हैं।

जनवरी 15, 2013

कुम्भ नहाना बना एक बड़ी मुसीबत

रिपोर्ट सहरसा टाईम्स: सहरसा रेलवे स्टेशन पर कुम्भ जाने वाले यात्रियों का हुजूम जमा है लेकिन इनके लिए अलग से कोई विशेष ट्रेन का इंतजाम नहीं है। न तो किसी तरह के आरक्षण टिकट की कोई बात है और न ही कोई अलग से कोई विशेष सुविधा। कुम्भ नहाकर लोग पुण्य का भागी बनना चाहते हैं लेकिन कुम्भ की यात्रा इस इलाके के लोगों के लिए एक बड़ी मुसीबत है। महिलायें,पुरुष और बच्चे सभी पुण्य के भागीदार बनने के लिए कुम्भ जाकर स्नान करना चाहते हैं। कोसी के विभिन्य इलाके से लोगों का जत्था रेलवे स्टेशन पर सुबह से ही जमा है लेकिन उनकी यात्रा मंगलमय हो इसके लिए रेलवे की तरफ से कोई अतिरिक्त इंतजाम नहीं हैं।
अजय शर्मा,बुकिंग क्लर्क
 यात्री कैसे अपने गंतव्य तक ससमय पहुंचेंगे इसको लेकर रेल प्रशासन कहीं से भी गंभीर और चिंतित नहीं है। अनिल कुमार,उषा देवी,निर्मला देवी और अजय कुमार जैसे कई यात्री से सहरसा टाईम्स  ने पूछताछ की तो लगभग सभी यात्री हलकान----परेशान हैं की आखिर वे कैसे अपनी यात्रा को पूरी कर पायेंगे। आरक्षण काउंटर पर बैठे बुकिंग हाकिम अजय शर्मा,बुकिंग क्लर्क बताते हैं की कुम्भ जाने वाले के लिए कोई अलग से कोई इंतजाम नहीं है। कुम्भ नहाना इस इलाके के लोगों के लिए न केवल पहाड़ खोदकर दूध निकालने के समान है बल्कि जी का जंजाल भी बना हुआ है।

अस्पताल है या मजाक

मुकेश कुमार सिंह, एक्सक्लूसिव रिपोर्ट--------
सहरसा सदर अस्पताल इनदिनों पूरी तरह से मजाक बना हुआ है। यहाँ पर कोई नियम--कायदा नहीं है। सबकुछ बस भगवान् भरोसे है। इस अस्पताल के प्रसव कक्ष और आपातकालीन कक्ष में रुम हीटर नहीं है। इस जानलेवा ठंढ से बचने के लिए इन कक्षों में अलाव जलाकर मरीज और मरीज के परिजन यहाँ अपनी जिन्दगी बचाने की कवायद कर रहे हैं। यह सारा तमाशा और जानलेवा खेल नियम के बिलकुल खिलाफ हो रहा है। लेकिन स्वास्थ्य प्रशासन इससे पूरी तरह बेखबर बना खामोशी से महज तमाशबीन है। जाहिर तौर पर धुएं से मरीजों और नवजात बच्चा--जच्चा को जान का खतरा है। यही नहीं प्रसव कक्ष में महिला बेड पर पुरुष कब्जा जमाकर हैरतंगेज तरीके से आराम भी फरमा रहे हैं, गोया वे खुद गर्भवती हों,या फिर कोई प्रसूता।
                           सबसे पहले आपातकालीन कक्ष का नजारा। खिये इस कक्ष का आलम।अलाव जल रहा है और पुरे कक्ष में धुंआ भरा हुआ है।सरकार के निर्देश के मुताबिक़ कम से कम तीन जगहों आपातकालीन कक्ष,प्रसव कक्ष और ऑपरेशन कक्ष में रूम हीटर की व्यवस्था होनी चाहिए लेकिन यहाँ सबकुछ हवा--हवाई है।अब चलिए महिला प्रसव कक्ष।देखिये यहाँ भी जोगाड़ टेक्नोलोजी से अलाव का इंतजाम किया गया है।यहाँ पर बच्चा--जच्चा दोनों की जान खतरे में है।लेकिन क्या करें जब रूम हीटर या फिर कोई बड़ी व्यवस्था नहीं हो तो इस कड़ाके की ठंढ में जान बचाने के लिए कुछ तो करना पडेगा ही।नूतन देवी और कुंती देवी जैसी कई महिलायें कह रही हैं की यहाँ पर कोई व्यवस्था नहीं है।जान बचाने के लिए इस तरह से आग जलाना उनकी विवशता है।।
मोहम्मद सद्दीक गर्भवतीके बेड पर

अब सहरसा टाईम्स की एक्सक्लूसिव तस्वीर से हम आपको रूबरू करा रहे हैं। देखिये यह है गायनिक कक्ष। इस कक्ष के बेड पर या तो गर्भवती या फिर प्रसूता महिला को होना चाहिए लेकिन इस बेड पर मोहम्मद सद्दीक भाई ने ना केवल कब्ज़ा जमा रखा है बल्कि इस बेड पर वे लोटन कबूतर भी बने हुए हैं। हमने जब यह तस्वीर देखी तो पहले तो हमारा कलेजा मुंह को आ गया लेकिन जब हम थोड़ा संभले तो इस अस्पताल की दुर्दशा पर एक मुश्ते तरस आया। हमने सद्दीक भाई को काफी कुरेदा की वे गर्भवती हैं या फिर प्रसूता।गर्भवती है तो सिस्टर ने क्या कहा और प्रसूता है तो उन्हें लड़का हुआ या फिर लड़की। लेकिन सद्दीक भाई बड़े मंझे हुए खिलाड़ी थे। बस हमें यूँ ही उलझाते रहे और कुछ भी साफ़---साफ़ नहीं बताया। ज्यादातर वे खामोश ही रहे। लेकिन वे इतना जरुर कह गए की इस बेड की महिला कहीं गयी थी इसलिए वे यहाँ पर आसीन हो गए। आप इनकी हालत को देखें।
इस अस्पताल में जो भी हो रहा है, हमारी समझ से बहुत कम हो रहा है।इस अस्पताल का कोई माई--बाप नहीं है।यह तरह--तरह के कारनामे करने वाला और गुल खिलाने वाला अस्पताल है।

*अपनी बात*

अपनी बात---थोड़ी भावनाओं की तासीर,थोड़ी दिल की रजामंदी और थोड़ी जिस्मानी धधक वाली मुहब्बत कई शाख पर बैठती है ।लेकिन रूहानी मुहब्बत ना केवल एक जगह काबिज और कायम रहती है बल्कि ताउम्र उसी इक शख्सियत के संग कुलाचें भरती है ।