नवंबर 29, 2014

सरे राह किसने भरी मांग में सिंदूर------

रजनीश कुमार
मुकेश कुमार सिंह की कलम से-----
अगर आपके घर में कोई मासूम बच्ची है और वह पढ़ने के लिए स्कूल,कॉलेज या फिर कोचिंग जा रही है तो हो जाइए होशियार.जनाब राह चलता कोई मनचला कहीं आपकी घर की ईज्जत की मांग में सिंदूर ना डाल दे.ताजा वाकया सहरसा के सदर थाना के नया बाजार की है जहां एक मनचले आशिक ने अपने कुछ मित्रों साथ मिलकर दशवीं कक्षा की एक छात्रा को कोचिंग जाने के दौरान जबरन ना केवल उसकी मांग में सिंदूर डाल दिया बल्कि उसे अगवा कर ले भागने की कोशिश भी की.हांलांकि किसी तरह लड़की ने अपनी जान बचाई और अपने परिजन के साथ थाने पहुंची,जहां पुलिस ने मामला दर्ज करते हुए मुख्य आरोपी को अपनी गिरफ्त में ले लिया है.दिन--दहाड़े घटी इस घटना से इलाके में सनसनी फैली हुयी है.
 
सदर थाने में मौजूद यह बच्ची राजकीय कन्या हाई स्कूल की दशवीं कक्षा की छात्रा है.आज सुबह यह सदर थाना के न्यू कॉलोनी स्थित अपने आवास से वह नया बाजार पढ़ने के लिए कोचिंग जा रही थी.कोचिंग से कुछ पहले ही सदर थाना के न्यू कॉलोनी मोहल्ले का रहने वाले रजनीश कुमार अपने चार--पांच साथियों के साथ घात लगाए हुए बैठा हुआ था.मासूम जैसे ही वहाँ पहुंची रजनीश ने पहले तो उसे दबोच लिया फिर जबरन उसकी मांग में सिंदूर डाल दिया.इतना ही नहीं रजनीश ने पुलिस लिखे नंबर प्लेट वाली मोटरसाईकिल से मासूम को लेकर भागने की कोशिश भी की.लेकिन किसी तरह से अपना हाथ छुड़ाकर मासूम पड़ोस के एक घर में घुसकर पहले तो अपनी जान बचाई फिर वहीँ से अपने परिजन को फोन किया.फिर वह अपने परिजन के साथ थाने पहुंची जहां मासूम के पिता सतीश कुमार झा के आवेदन पर मामला दर्ज करते हुए पुलिस ने त्वरित गति से मुख्य आरोपी को अपनी गिरफ्त में ले लिया.गौरतलब है की रजनीश पिछले कई महीने से मासूम के साथ छेड़खानी और जोर--जबरदस्ती कर रहा था.
इधर पुलिस की गिरफ्त में आये रजनीश का कहना है की मासूम उससे एकतरफा प्यार करती थी.वह बीए पार्ट वन का छात्र है.बीते कई महीने से मासूम उसे ना केवल फोन करती थी बल्कि उसे गिफ्ट भी देती थी.लेकिन वह मासूम से प्यार नहीं करता था.उसने पहले भी मासूम को कई दफा समझाया था की वह उससे प्यार नहीं करता है.आज भी वह मासूम को समझाने की कोशिश कर रहा था लेकिन मासूम ने अपने पर्स में रखे सिंदूर को जबरन निकालकर उसके हाथ में दे दिया और जबरदस्ती अपने मांग में लगा लिया.खुद को बेकसूर बताते हुए रजनीश कह रहा है की प्यार में अंधी हुयी मासूम ने उसे फंसा डाला.पुलिस के अधिकारी मृत्युंजय कुमार चौधरी,ए.एस.पी,सहरसा घटना के बाबत जानकारी देते हुए कह रहे हैं की मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी की जा चुकी है और पुलिस आगे का अनुसंधान कर रही है.आगे अगर इस मामले में अन्य की संलिप्तता की बात सामने आएगी तो उनकी भी गिरफ्तारी होगी.
घोर कलयुग आ गया है.कानून और पुलिस वाले दहशतगर्दों के सामने बिल्कुल बौने साबित हो रहे हैं.आगे इस मामले में जैसी भी कार्रवाई हो लेकिन फिलवक्त इलाके के वैसे माँ--बाप जिनको बेटियां हैं वे अपनी--अपनी बेटी को लेकर खासे चिंतित और खौफजदा हैं.

सितंबर 28, 2014

बाढ़ राहत लेने जा रहे युवक की ट्रेन से गिरकर मौत

बाढ़ राहत के लिए अपने गाँव से कुछ पीड़ितों के साथ ट्रेन से सलखुआ प्रखंड आ रहे एक तीस वर्षीय युवक की मौत ट्रेन से गिरकर हो गयी.मृतक धमारा स्टेशन से कोपरिया स्टेशन आ रहा था की ट्रेन से उतरने के दौरान कोपरिया स्टेशन पर वह ट्रेन की चपेट में आकर गंभीर रूप से जख्मी हो गया.सलखुआ थाना के साम्हर कला गाँव के रहने वाले जख्मी ख़ुशी लाल चौधरी की मौत सदर अस्पताल में ईलाज के दौरान हो गयी.राहत लेने से पहले ही वह इस दुनिया से कूच कर गया.सदर अस्पताल के आपात्कालीन कक्ष के बेड पर ख़ुशी लाल चौधरी की लाश पड़ी हुयी है.ट्रेन से गिरकर जख्मी होने के बाद इसे पहले सलखुआ PHC ले जाया गया लेकिन स्थिति गंभीर देखते हुए वहाँ से इसे सदर अस्पताल रेफर कर दिया गया.सदर अस्पताल में डॉक्टरों ने इसे बचाने की भरपूर कोशिश की लेकिन इसे बचाया नहीं जा सका.तीन बच्चों का पिता सरकारी राहत लेने से पहले ही इस दुनिया को खुदा हाफिज कह दिया.अब कोई भी राहत इसे ज़िंदा नहीं कर सकती.मृतक के चाचा जय जय राम चौधरी और वीरो चौधरी सहरसा टाईम्स को घटना की पूरी जानकारी देते हुए रो पड़ते हैं..
पुलिस के अधिकारी शम्भू नाथ तिवारी,एसआई,सदर थाना,सहरसा पंचनामा बनाकर घटना की जानकारी दे रहे हैं और कार्रवाई के नाम पर केश दर्ज करने की बात कर रहे हैं.
सरकारी बाढ़ राहत लेने आ रहे थे की घर का खमाॉश चूल्हा जलेगा लेकिन उसे क्या पता थी की चूल्हे की अंगीठी जलने की जगह उसकी चिता में ही आग लगने वाली है.आगे रब जाने की इसे अब कैसी सरकारी मदद मिलेगी.

सितंबर 23, 2014

बंदी गए भूख हड़ताल पर


मंडल कारा सहरसा के पचास से ज्यादा बंदी पूर्व सांसद आनंद मोहन के नेतृत्व में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर चले गए हैं.इस वर्ष ईलाज के अभाव में तीन बंदियों की हुयी मौत की न्यायिक जांच नहीं होने,मृतक बंदियों को मुआवजा नहीं मिलने,जेल के भीतर स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार नहीं होने,जेल के भीतर विभिन्य तरह के काम करने वाले बंदियों को मिलने वाले पारिश्रमिक में अनियमितता,जेल के भीतर घटिया खाद्य सामग्री की आपूर्ति और जेल के भीतर विभिन्य निर्माण कार्यों में अनियमितता सहित कई अन्य मांगों को लेकर बंदी भूख हड़ताल को विवश हुए हैं.बताते चलें की अभी हड़ताल में शामिल बंदियों की संख्यां करीब पचास है लेकिन आगे हड़ताल जारी रही तो में बंदियों की संख्यां में क्रमवार ईजाफा होगा.इस पुरे मसले पर फिलवक्त जेल प्रशासन ने हमसे कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया.

पूर्व सांसद के घर मिली युवक की लटकती लाश


मधेपुरा के राजद सांसद पप्पू यादव द्वारा डॉक्टर और पैथोलॉजिस्टों को जारी नाजी फरमान से हलकान--परेशान कोसी इलाके का माहौल अभी नरम भी नहीं पड़ा था की जदयू के कद्दावर नेता और खगडिया के पूर्व सांसद दिनेश चन्द्र यादव के सहरसा जिला मुख्यालय के कायस्थ टोला स्थित आवासीय परिसर के एक कमरे से बरामद एक युवक की लटकती लाश ने पुरे इलाके में सनसनी फैला दी है.मृतक पल्लव कुमार झा कायस्थ टोला का ही रहने वाला था जो केबल का काम करता था.भीतर से बंद कमरे में युवक की लाश मिली है लेकिन मृतक के परिजन का आरोप है की सांसद के बॉडी गार्डों ने उसकी हत्या कर लाश को लटका दिया है.
इस मामले में सांसद ने निष्पक्ष जांच की मांग के साथ--साथ जांच में पुलिस को भरपूर सहयोग करने का भरोसा दिलाया है.जदयू में बड़ी हैसियत रखने वाले कोसी इलाके के कद्दावर जदयू नेता और खगडिया के पूर्व सांसद दिनेश चन्द्र यादव के आवास के बाहर मेले की शक्ल में लोगों का हुजूम जमा है.ये सारे लोग किसी दावत में नहीं आये हैं बल्कि एक युवक की जो लाश मिली है उसके पीछे का रहस्य क्या हैं.यानि यह हत्या है या फिर आत्महत्या,इस सच को यहां मौजूद हर कोई जानना चाहता है
चूँकि मामला हाई प्रोफाईल है,इसलिए पुलिस के अधिकारी फूंक--फूंक के कदम रख रहे हैं.हांलांकि फिलवक्त जिले में ना तो एसपी पंकज कुमार सिन्हा मौजूद हैं और ना ही एसडीपीओ प्रेमसागर.सारी कमान अभी सूर्यकांत चौबे,इन्स्पेक्टर साहब के जिम्मे है.इनका कहना है की परिजन के बयान पर मामला दर्ज होगा और आगे की जांच में जो कुछ निकलेगा,उसी आधार पर कार्रवाई होगी.
इस मामले ने पुरे इलाके को हिलाकर रख दिया है.चूँकि मामला ना केवल पूर्व सांसद के आवास से जुड़ा है बल्कि आरोप भी उनके बॉडी गार्डों पर ही लग रहा है,ऐसे में निष्पक्ष जांच पर संसय बरकरार है.आगे देखना दिलचस्प होगा पुलिस की जांच कितनी पाक--साफ़ और मृतक को इन्साफ दिलाने लायक होती है.यूँ घटनास्थल की परिस्थिति आत्महत्या की कम और हत्या की ओर ज्यादा इशारे कर रही है.

मई 15, 2014

स्वप्न या हकीकत


एक अजीब  सी कहानी है. एक लड़का है अपने माता-पिता का दुलारा है. बचपन कि दिवार लांघ  कर वो जब जवान होता है तब अपने माता पिता के सपनों कि रथ पर सवार होकर निकल पड़ता है अपनी मंजिल कि तरफ़. बहुत खुश है वो  है वो. बहुत तेज चलता है पर सभल के चलता है और आपने रास्ते से भटकता नहीं है.
अब मंजिल बहुत करीब दिखती है. दिल में जीत कि फुहार उठतीं है पर अचानक रथ का पहिया टूट जाता है. लड़का जमीन पर गिरता है उसका सर फुट जात है उसका एक पैर टूट जाता है. मंजिल सामने है पर अब वो चल नहीं सकता. रेंग रहा है पर ज्यादा रेंग नहीं सकता, वो चिल्लाता है रोता है पर कुछ कर नहीं पाता है वो. खुद के ठीक होने का अब इँतजार भी नहीं कर सकता। क्योंकि जिस रथ पर वो सवार थ उसे बनाने के लिये उसके मात पिता अपनी साडी कमाई खर्च कर चुके थे, सारे जमीने बेच चुके थे.
अब लड़के को मंजिल दुर होता प्रतीत होता है. दूर होते होते मंजिल गायब हो जाता है. लड़के को अपने माता पिता कि बाते याद आती है कि '' अब लौटना तो जीत कर लौटना, अपनी मंजिल को पा कर लौटना।''
इतने में मुझे कुछ आहट सी  होती  है, मेरी नींद खुलती है. मैं  शायद  सपनों मे खोया था , पर आँख खुलने तक मै बहुत रोया था. पर रोया क्योँ ? क्या उस लड़के को मैं पहचानता था मै ? कौन था वो कहीं मै हि तो नही था या आपमे से  कोइ एक था. मर चुका है मेरे सपनों मे वो पर अभी भि उसे ढूँढ  रहा हूँ मै.…………………। 

कुंदन मिश्रा
पिता ७ अशोक कुमार मिश्रा
संत नगर - सहरसा

अप्रैल 23, 2014

नरेंद्र मोदी कल सहरसा में

प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी गुरुवार को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच स्थानीय पटेल मैदान में चुनावी सभा को संबोधित करेंगे। उनकी सुरक्षा के कड़ी इंतजाम किए जा रहे हैं। सहरसा में ३० अप्रैल को चुनाव होनी है. कल तक जो लोग मोदी को टीवी पर देखा करते थे वह चाय बेचने वाला देश का भावी प्रधानमंत्री सहरसा के पटेल मैदान के मंच से लोगो को सम्बोधित करेंगे। गॉव घर से लोगों का आना शुरू हो चूका है मोदी के दूर दराज का समर्थक अपने रिश्तेदार के यंहा आकर डेरा जमा दिए है. मोदी के मंच पर भीड़ न लगे इसके चलते दो मंच का निर्माण किया जा रहा है एक मंच से मोदी लोगो को  सम्बोधित करेंगे तो  दूसरे मंच पर प्रदेश स्तर के नेता, विधायक व सांसद होंगे। सुरक्षा को लेकर आइबी की टीम और गुजरात से भी डीआइजी एवं डीएसपी रैंक के अधिकारी सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेने पहुंचे चुके हैं. सुरक्षा के ख़ाश  इंतजाम को लेकर डी एरिया को मेटल डिडेक्टर से जाँच की जा चुकी है. नरेंद्र  मोदी की सभा को सफल बनाने के लिए भाजपा के कार्यकर्ताओ  और विधायकों ने  पूरी ताकत लगा दी  है। शहर से लेकर सुदूर गांव व कस्बों लोगो को मोदी के सभा में आने को आमंत्रित कर रहे है.

अप्रैल 03, 2014

किसी तरह रात का खाना बन जाए

रिपोर्ट सहरसा टाईम्स: भविष्य संवारना किसे अच्छा नहीं लगता,सपने देखना किसे अच्छा नहीं लगता.लेकिन जहां गरीबी और मुफलिसी में जिदगी जार-जार हो और जहां एक जून रोटी का जुगाड़ मील का पत्थर साबित हो रहा हो वहाँ सपने नहीं पलते,वहाँ जिन्दगी बस घिसटती,रिसती--सिलती यूँ ही कब शुरू और कब खत्म हो जाती है,कुछ पता ही नहीं चलता.सहरसा का आलम कुछ ऐसा है की यमराज को भी रोना आ जाए.सुदूर ग्रामीण इलाके की बात तो छोड़िये जिला मुख्यालय में मासूम नौनिहाल थोक में अपना भविष्य संवारने की जगह सड़कों के किनारे, ऑफिस--ऑफिस या फिर जिधर पेड़ों से भरे इलाके हैं उधर पत्ते  और जलावन चुनने में सुबह से शाम कर देते हैं.ये वे तंगहाली की कोख से जन्मे बच्चे हैं जो पत्ते और जलावन चुनकर ले जाते हैं तो घर का चूल्हा जलता है फिर सडा--गला कुछ पकता है और फिर कुलबुलाते पेट की ज्वाला शांत होती है.सरकारी इंतजामात से महरूम घरों में अभिशाप की तरह पैदा हुए इन बच्चों को क्या पता की इनके घर के बड़ो और खुद उनपर सियासतदान सियासत की बड़ी--बड़ी सीढियां चढ़ते हैं.एक तरफ गरीबों और बच्चों के नाम प़र योजनाओं की आई सुनामी थमने का नाम नहीं ले रही है तो दूसरी तरफ सरकारी खजाने के मुंह इनके लिए यूँ खुले हैं की कभी बन्द होने का नाम ही नहीं लेते,फिर भी ये गरीब घर के बच्चे दोजख की बेजा जिन्दगी जीने को विवश हैं.सरकार के सारे नारे--दावे "सब पढ़े--सब बढे" और "मुनिया बेटी पढ़ती जाए" सहरसा में पूरी तरह से दफ़न हो रहे हैं.
सुशासन बाबू आँखों प़र चढ़ा सरकारी चस्मा उतारिये और इन तस्वीरों को देखिये.हमें पता है की आप संवेदनशील मुख्यमंत्री हैं.आपका कलेजा इन तस्वीरों को देखकर जरुर फट पड़ेगा.अगर ये तस्वीरें आपको दहला--रुला नहीं सकीं तो यकीन मानिए आगे हम कोसी तटबंध के भीतर और सुदूर ग्रामीण इलाके की तस्वीरें लेकर आयेंगे जो सुशासन के सारे ढोल--ताशे के चिथड़े तो उड़ाएंगी ही,साथ ही सुशासन या कुशासन या फिर ठगासन सभी की सारी पोल--पट्टी भी खोलकर रख देंगी.जागिये नीतीश बाबू जागिये.इतना आसान नहीं है विकसित बिहार के सपने को सच कर दिखाना.

फ़रवरी 18, 2014

नये थानाध्यक्ष की पदस्थापन सूची

चुनाव से पहले दस थाना व चार ओपी में नये थानाध्यक्ष की पदस्थापना।
पदस्थापित अधिकारियों की सूची

       नाम   - कहां थे- कहां गये
1.    सूर्यकांत चौबे  - इंस्पेक्टर- थानाध्यक्ष, सदर

2.    नन्हकू राम   - महिषी - थानाध्यक्ष, बिहरा

3.    अनुज कुमार सिंह - पुलिस केन्द्र- थानाध्यक्ष बनगांव

4.    रामइकबाल यादव  - पुलिस केन्द्र- थानाध्यक्ष, जलई

5.    केबी सिंह- पुलिस केन्द्र  - थानाध्यक्ष, सौरबाजार

6.    जगनिवास सिंह- पुलिस केन्द्र  - थानाध्यक्ष, सोनवर्षा राज

7.    आरके शरण- इंस्पेक्टर, पुलिस केन्द्र  - थानाध्यक्ष, सिमरीबख्तियापुर

8.    मनीष कुमार रजक- पुलिस केन्द्र  - थानाध्यक्ष, बसनही

9.    वकील यादव- पुलिस केन्द्र-   थानाध्यक्ष, सहरसा

10.   आरती सिंह- पुलिस केन्द्र-   थानाध्यक्ष, महिला थाना

11.   मो. इजहार आलम- पुलिस केन्द्र-   थानाध्यक्ष, पतरघट ओपी

12.   सुमन कुमार- पुलिस केन्द्र -  थानाध्यक्ष, डरहार ओपी

13.   जीतेन्द्र चौधरी- पुलिस केन्द्र  - थानाध्यक्ष, काशनगर ओपी

14.   जीतेन्द्र सहनी- पुलिस केन्द्र  - थानाध्यक्ष, बनमा ईटहरी ओपी

जनवरी 31, 2014

संविदा कर्मी को नीतिशिया लाठी का तौफा

एक मजबूर संविदा कर्मी द्वारा भेजा गया खबर.… संविदा पर काम करे कंप्यूटर ऑपरेटर को सरकारी नौकरी तो नहीं लेकिन सरकारी लाठी नसीब हुआ. पटना कि घटना से सभी संविदा पर काम कर रहे डाटाइंट्री ऑपरेटर अपने भविष्य को लेकर काफी चिंतित है. दुःख की बात है कि बेल्ट्रॉन के 25 डाटाइंट्री ऑपेरटरों को नौकरी से निकाल दिया गया. जिन अन्य  ऑपरेटरों ने सरकार के इस फैसले के खिलाफ आवाज़ उठाई, उन्हें मारा गया, पीटा गया, उन पर अपराधिक मुक़दमे दर्ज किये गए, और उन्हें जेल में ठूंस दिया गया. सवाल यह है कि एक तरफ किसी विभाग में कई वर्षो से कार्यरत ओपरेटर को भारी संख्या में निकाला जाता है और दूसरी तरफ पैनल बनाकर सरकारी महकमा डाटाइंट्री ऑपरेटर को रिज़र्व रखता है. ऐसी बर्बरता तो शायद लाभ घाटे के गणित पर चलने वाली कोई निजी कम्पनी भी न करता है.
 कंप्यूटर ऑपेरटरों ने अपने भविष्य को सुरक्षित करने की सरकार से गुज़ारिश की, बात नहीं बनी तो न्यायालय के शरण में गए. सरकार इन्हें राहत देने के बजाय इनके हिम्मत को तोड़ने के लिए, इनका फन कुचलने के तरीके अपनाये। पांच-छह साल काम करने के बाद अब फिर से पढाई करना, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना- क्या ये व्यावहारिक है?  इसी कई जगहों पर कार्य कर रहे आई टी असिस्टेंट्स को अचानक हटा दिया गया, क्योंकि सरकार के पास अब उनके लिए काम नहीं है. अब सरकार के पास काम नहीं है.
नितीश बाबू सूबे का सभी कार्यालय संविदा कर्मियों के बदोलत चल रहा है. ८० प्रतिशत कार्यालय संविदा कर्मी से चलता है यदि इनके साथ आपका यह वर्ताव रहा तो एक और क्रांति होगा जिसे आप सहन नहीं कर पाएंगे। 
दोस्तों सभी कंप्यूटर ऑपरेटर से अपील है सब एक होकर यदि नहीं रहेंगे तो इसका बहुत बुरा परिणाम होना वाला है जिसका प्रभाव सिर्फ हमें नहीं बल्कि हमारे पारिवारिक जीवन पर भी असर पड़ेगा. कई दोस्तों के दिल में बेलट्रॉन और एक्सक्यूटिव असिस्टंट को लेकर अंतर बना रहता है. भाई ये सब सरकारी कूट नीति  है जिसके कारण हम एक दूसरे को नीचे दिखाने  कि कोशिश करते है और इसका मजा नियमित कर्मी लेता रहता है. अरे भाई सब तो आखिर ओपरेटर है है न. दोस्तों अब समय आपस में एक दूसरे को नीचे दिखाने  का नहीं है एक साथ होकर लड़ने का है आओ एक साथ लड़े. नहीं तो उम्र के साथ अपनी लाइफ़ भी बल्ले बल्ले।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
 

जनवरी 03, 2014

राजनेताओं के अमर्यादित बयानबाजी से लोकतंत्र को बड़ा खतरा

 मुकेश कुमार सिंह की कलम से---------- 
देश के अंदर कई बड़े मुद्दे और जलते हुए सवाल हैं जिनपर लगातार बहस और विमर्श किये जाने की जरुरत है।लेकिन आज हम देश के विभिन्य सूबे से लेकर राष्ट्रीय राजनीति में राजनेताओं के द्वारा की जा रही अमर्यादित बयानबाजी को लेकर चर्चा के लिए विवश हुए हैं।आज के राजनीतिक परिवेश में यह चिंता का विषय बन चुका है कि राजनीति में मर्यादा के लिए कोई जगह शेष भी है अथवा नहीं।यूँ हम डंके की चोट पर कहते हैं कि आजादी के कुछ समय बाद से ही यह परिलक्षित होने लगे थे कि भारतीय राजनीति में मर्यादा को संजोने के लिए कोई अतिरिक्त व्यवस्था नहीं की गयी है।आज परिणाम सामने है कि स्थिति ना केवल विस्फोटक बल्कि भयावह शक्ल अख्तियार कर चुकी है।
लोकतांत्रिक ढाँचे में भारत एक अजूबे देश की श्रेणी में है जहां शासन के शीर्ष पर बैठे लोगों के लिए कोई वैधानिक योग्यता और मापदंड तय नहीं हैं।इतने बड़े देश के लिए जहां उत्कृष्ट राजनीतिक व्यवस्था के इंतजाम होने चाहिए वहाँ छिन्न--भिन्न और टूटी--बिखड़ी परिपाटी के अस्थिपंजर राजनीति के परचम लहरा रहे हैं।हम शब्दजाल में ना तो खुद और ना ही आपको उलझाने की मंशा रखते हैं,इसलिए मौजूं सवाल पर आ रहे हैं।देश आज राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है।विभिन्य राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों के नेता एक दूसरे पर अमर्यादित शब्दों के विष वाण छोड़ रहे हैं।राजनेताओं के ऐसे उत्तेजक और बहुघाती बयान आ रहे हैं जो भारतीय सामाजिक व्यवस्था के लिए कहीं से भी शुभ संकेत देने वाले नहीं कहे जा सकते।
अमूमन मामलों पर गौर करें तो खासकर चुनाव के समय विभिन्य दलों के नेताओं के बयान एक दूसरे पर ना केवल हमलावर होते हैं बल्कि कतिपय धारदार और असहज होते हैं।हमें यह कहने में कतई गुरेज नहीं है कि ऐसे बयान राजनीतिक दलों के साथ--साथ आम जनता के बीच भी कटुता पैदा करने का काम करते हैं।यह बिलकुल आईने की तरह साफ़ है कि बयानों में इस्तेमाल हो रही भाषा लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ हैं।हमारी समझ से राजनीतिक संवाद का मौजूदा स्वरूप अत्यंत चिंतित करने वाला है जो राजनीतिक अपरिपक्वता से लवरेज है।हालिया समय पर गौर करें तो एक दूसरे को बस जबाब देने की होड़ लगी है लेकिन किसी भी स्तर पर और सार्थक बहस की गुंजाईश कम होती जा रही है।कुल मिलाकर किसी भी दल की तरफ से यह प्रयास नहीं हो रहा है कि राजनीतिक संवाद का तौर--तरीका बदले और वह मर्यादित स्वरूप ले। जहांतक दूसरे प्रतिष्ठित देशों का सवाल है तो वहाँ भारतीय राजनीतिक विचित्रता के ठीक उलट स्थिति है।वहाँ राष्ट्रपति,प्रधानमन्त्री सहित विभिन्य जिम्मेवारी भरे पदों पर आसीन होने वाले उम्मीदवारों के बीच विकास,देशहित और विदेश नीति को लेकर सार्थक,समृद्ध और बड़ी बहस होती है जो तर्कों के साथ--साथ साक्ष्यों पर आधारित होती हैं।जाहिर तौर पर यहाँ भी बयानबाजी होती है लेकिन उसमें जलालत भरे गलीज आरोप---प्रत्यारोप और व्यक्तिगत हमले नहीं होते हैं।इस बहस पर जनता की  सीधी और कड़ी नजर रहती है।
फिलवक्त यहाँ देश स्तर पर चल रही बयानबाजी पर गौर करें तो विभिन्य मंचों से भाजपा द्वारा प्रधानमन्त्री पद के सम्भावित दावेदार नरेंद्र मोदी कॉंग्रेस के शीर्षस्थ नेताओं से लेकर अन्य दलों पर विष वाण छोड़ रहे हैं।नरेंद्र मोदी द्वारा कॉंग्रेस के खूनी पंजे वाले बयान और कॉंग्रेस के पाप की उपज बसपा और सपा पर कड़ी आपत्ति जतायी गयी।कॉंग्रेस के सिरमौर्य राहुल गांधी के तेवर भी नरेंद्र मोदी पर ज्यादातर तल्ख़ और हमलावर ही दिखे हैं और उन्होनें कई असहज बयान भी दिए हैं।मुजफ्फरनगर दंगे में राहुल गांधी के दिए यह बयान कि "वहाँ के दंगाई आई.एस.आई के सम्पर्क में थे" पर कडा विरोध जताया गया। बात यहीं पर नहीं थम रही बल्कि भाजपा और कॉंग्रेस के कई बड़े नेता लगातार एक दूसरे के आमने--सामने हैं।कॉंग्रेस के दिग्विजय सिंह,कपिल सिंबल और मनीष तिवारी हों या फिर भाजपा के अरुण जेटली,मुख्तार अब्बास नकवी,शहनवाज हुसैन के साथ--साथ और शीर्षस्थ नेताओ की टोली सभी की भवें अक्सर एक--दूसरे पर तनी ही रहती हैं।इस कड़ी में हम बिहार के कुछ बयान बहादुरों की चर्चा भी जरुर करना चाहेंगे।भाजपा के कद्दावर नेता सुशील कुमार मोदी ने खूंखार आतंकी यासिन भटकल को बिहार का दामाद तक कह डाला तो जदयू के मौजूदा मंत्री भीम सिंह ने सैनिकों की शहादत पर ही चुटकी ले ली।यही नहीं बीते कई महीनों से सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर भाजपा के गिरिराज सिंह के हमले और जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार और संजय सिंह के बयान भी मर्यादा की दीवार गिरा रहे हैं।
जो कुछ सामने है उसके मुताबिक़ देश की राजनीति का स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है। विभिन्य राजनीतिक दल एक दूसरे को नीचा दिखाने लिए गड़े मुर्दे उखाड़ने और उनके जरिये सनसनीखेज और आपत्तिजनक आरोप लगाने में पिले हुए हैं।हाल के दिनों में कई नेताओं के खिलाफ ऐसे आरोप उछाले गए हैं जिसका इस्तेमाल पहले भी किया जा चुका है।जाहिर तौर पर वक्त बहुत नाजुक हो चला है और ऐसे में यह आवश्यक हो गया है कि राजनीतिक दल इस पर विचार करें कि बयानबाजी का स्तर कैसे सुधारा जाए?केवल चुनाव के समय ही नहीं बल्कि सामान्य अवसरों पर भी नेताओं को अपनी बयानबाजी में संयम और शालीनता का परिचय देना होगा।
नेताओं के अमर्यादित बयानबाजी के सन्दर्भ में निर्वाचन आयोग की भूमिका अत्यंत  लाचारी भरी और सीमित नजर आती है।निर्वाचन आयोग ने हाल के दिनों में कुछ नेताओं के बयानों और टिप्पणियों पर संज्ञान लिया है।खासकर के राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के बयानबाजी को लेकर निर्वाचन आयोग गम्भीर हुआ है।लेकिन आयोग के हाथ बंधे हुए हैं।निर्वाचन आयोग के पास इतनी संवैधानिक ताकत नहीं है कि वह नेताओं के बड़बोलेपन पर कोई कठोर कारवाई का रास्ता तैयार कर सके।आयोग ऐसे बयान बहादूरों के मामले में अधिक से अधिक अपनी असहमति जताने,चेतावनी देने और फटकार लगाने तक ही सीमित है।
हम इस आलेख को बस आपके सम्मुख परोसकर कतई निकल जाना नहीं चाह रहे हैं। बल्कि हम इसके जरिये यह भी चाह रहे हैं कि राजनेताओं के मर्यादित बयानबाजी के लिए बड़ा हस्तक्षेप हो।हमारी समझ से इसके लिए संसद के दोनों सदनों में बड़ी बहस करायी जानी चाहिए।इसके लिए संविधान में ना केवल कुछ नए अनुच्छेद की जरुरत है बल्कि इसके लिए कानून भी बनाये जाने चाहिए।इस मामले में हद की इंतहा है,इसलिए माननीय न्यायालय को भी चुप्पी तोड़कर,इस मामले में अब सीधा हस्तक्षेप करना चाहिए।
राजनेता देश की दिशा तय करने वालों में अगर्णी भूमिका निभाते हैं।उनके क्रिया--कलापों का जनता पर सीधा और व्यापक असर पड़ता है।ऐसे में नेताओं को पूर्वागढ़ से मुक्त और दूरदर्शी होने के साथ--साथ व्यक्तिगत और पार्टी हित की जगह देश हित का ख्याल रखना चाहिए। धर्म,सम्प्रदाय और जाति को बयानों में रखकर देश को ये नेतागण आखिर कबतक जलालत और फजीहत में झोंकते रहेंगे।आजादी के लगभग सात दशक के हम करीब हैं।लेकिन हमें जिस तरह से समृद्ध,संपन्न और एकीकृत होना चाहिए,वहाँ हम कतई नहीं दिख रहे हैं।विचारों का मतभेद और उसका स्खलन विकास का चट्टानी अवरोधक है।अब बदलाव की जरुरत है।गाँव से लेकर देश स्तर के शीर्षस्थ नेताओं को अपने तौर--तरीके बदलकर देश निर्माण की बात ना केवल सोचनी और गुननी होगी बल्कि नयी ऊर्जा के साथ उन्हें सामने आना होगा। दर्द,चुभन,सीलन,टीस और सिसकियाँ भरे इस देश को जलते रहने देना,कहीं से भी और कतई जायज नहीं है।वजूद तलाशते इस देश के राजनेताओं जागो और देश निर्माण की नयी पटकथा लिखो।
नोट ::--इस आलेख में जो भी कार्टून इमेज लगे है वह नेट के माध्यम से लिया गया है..

*अपनी बात*

अपनी बात---थोड़ी भावनाओं की तासीर,थोड़ी दिल की रजामंदी और थोड़ी जिस्मानी धधक वाली मुहब्बत कई शाख पर बैठती है ।लेकिन रूहानी मुहब्बत ना केवल एक जगह काबिज और कायम रहती है बल्कि ताउम्र उसी इक शख्सियत के संग कुलाचें भरती है ।